मुझको बहुत रुलाती है
हाय! रे उस बालक की
याद बहुत आती है
खड़ी चौराहे पर मै
लिये हाथ मे छाता
धूप का एक भी कण
मुझको ना छू पाता
आँखो मे चश्मा औढ़े
देख रही इधर उधर
खड़ी रही चुपचाप सी
गाड़ियों के छट जाने तक
अचानक उस पर नजर पड़ी
जिसने सिसकी थी भरी
आशा आँखो मे लिये
सूरत पसीने से भरी
कपड़ो के नाम पर
एक निक्कर थी फटी
नंगे पावँ और तत्ति जमीन
देख कर रह गयी ठगी
हाथ फैलाए बोला मुझसे
दीदी भूख बहुत लगी
रुपया एक दे दो मुझको
तुम लगती हो भली
मै हैरान हो देख रही थी
उसके नंगे पावों को
धूप से जो जल रहे थे
उसके कोमल गालों को
कभी देखती छाते को
कभी धूप के चश्मे को
कभी फैलाए हाथो को
कभी इकलौते कपड़े को
अचानक उसने मुझे हिलाया
जैसे सपने से जगाया
हाथ फैलाए वो खड़ा रहा
जिद्द पे अपनी डटा रहा
बगल मे लटके झोले को
मैने थोड़ा आगे सरकाया
सिक्का एक निकाला मैने
उसके हाथों मे थमाया
सिक्के को वो चूम रहा था
जाते जाते झूम रहा था
संग साथी को दिखा रहा था
खुशी बहुत मना रहा था
मन ही मन मै सोच रही थी
गरीबी को नोच रही थी
अन्दर से मै हिल गयी थी
वास्तविकता से मिल गयी थी
कविता गुज्जर

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