वो गोबर से लीपा, कच्चा सा आँगन 
वो बारिश की रिमझिम मे उठती
मिट्टी की खुशबू से
आज भी महक उठता है मन मेरा 

आँगन मे लगे नीम पर
झूला झूलती सखियाँ 
सखियों की खिलखिलाहट से 
आज भी खिल उठता है मन मेरा 

आँगन मे बंधी गायों को
चारा खिलाती हुई माँ 
माँ की छनछनाती चूडियों से
आज भी छनकता है मन मेरा 

वो सवेरे-सवेरे पिता का उठना 
वो गायों के थन से दूध दोहना 
गले मे पड़ी गायों की घंटियों से
आज भी आनंदित होता है मन मेरा 


आँगन मे जलता हुआ
वो मिट्टी का चूल्हा
चूल्हे से निकलते धुएँ से 
आज भी मचलता है मन मेरा 

कविता गुज्जर