सबसे पहले तो हमें यह समझना जरुरी है कि "जनसंख्या विस्फ़ोट" है क्या ?
साधारण शब्दों में कहें तो जब किसी देश की जनसँख्या की मृत्यु दर में कमी होती है, बाल मृत्यु दर में कमी होती है लेकिन जन्मदर और जीवन प्रत्याशा में वृद्दि होती है तो इन सबके संयुक्त प्रभाव के कारण जनसंख्या में बहुत तेजी से वृद्धि होती है l इस स्थिति को ही जनसँख्या विस्फोट कहा जाता है l
हमारे समय की सबसे विकट समस्या है जनसंख्या विस्फोट। जनसांख्यिकी के अनुसार, मार्च, 2020 तक विश्व की जनसंख्या सात अरब, अस्सी करोड़ हो चुकी है। दुनिया की आबादी को एक अरब तक पहुंचने में बीस लाख वर्ष का समय लगा, परंतु इसे सात अरब तक पहुंचने में केवल 200 साल लगे। पिछले 770 साल में विश्व की जनसंख्या 37 करोड़ से बढ़कर आठ अरब के आसपास जा पहुंची है।अभी 1,44,42,16,107 की जनसंख्या के साथ चीन दुनिया की सर्वाधिक आबादी वाला देश है। दूसरे स्थान पर भारत है, जिसकी कुल जनसंख्या एक जुलाई को अनुमानतः 1,39,19,42,558 हो गई है। हम किसी भी और संदर्भ में आगे हो ना हो.. पर इस संदर्भ में चीन को पछाड़ने के लिए तैयार है l

इस तरह की अवस्था अक्सर कम विकसित देशों में पायी जाती है. भारत इस अवस्था से 1970 के दशक में गुजर चुका है लेकिन अब भारत की जनसँख्या वृद्धि दर में तेजी से कमी आ रही है और भारत की जनसँख्या को अब अभिशाप नहीं माना जाता है क्योंकि भारत पूरी दुनिया में सबसे युवा देश है l लेकिन एक वक्त में हमारा भारत भी उस दौर से गुजरा था, पर अब उस पर हम लगभग काबू पा चुके हैं l इस समस्या के कई सामाजिक कारण है l

अशिक्षा: जनगणना 2011 के अनुसार भारत की जनसंख्या अभी भी केवल 74% ही शिक्षित है और गाँवों में तो यह आंकड़ा और भी कम है. इस कारण जनसंख्या को लेकर लोगों में कई तरह की भ्रांतियां हैं. गरीब लोग एक अतिरिक्त संतान को कमाई का साधन मानते है l
भारत में आज भी बहुत से लोग बच्चों को ईश्वर की देन मानते हैं. कुछ लोग तो बच्चों को धर्म से जोड़कर भी देखते हैं और गर्भ निरोधकों का प्रयोग करना धर्म के खिलाफ समझते हैं. इन सभी का मिलाजुला परिणाम जनसँख्या वृद्धि के रूप में सामने आता है l

परिवार नियोजन के प्रति उदासीनता: कुछ लोग तो परिवार नियोजन के साधनों को जानते भी नहीं हैं और कुछ लोग इन साधनों का प्रयोग करना अपने धर्म के खिलाफ मानते हैं जबकि कुछ लोग इन साधनों को खरीद नहीं सकते हैं हालाँकि ये साधन सरकार के द्वारा फ्री में दिए जाते हैं फिर भी इस्तेमाल नही करते हैं l 

मनोरंजन के साधनों की कमी: देश के बहुत से गाँवों में आज भी मनोरंजन के साधनों की कमी है जिसके कारण लोग सेक्स को मनोरंजन का साधन मानते हैं और परिवार बढ़ाते रहते हैं l

अंधविश्वास: शिक्षा की कमी के कारण लोग परिवार नियोजन के उपायों को ठीक से नहीं अपनाते हैं l जैसे- भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी लोग यह मानते हैं की, पुरुष नशबंदी कराने से व्यक्ति की ताकत कम हो जाती है और वह मेहनत का काम करने लायक नहीं रहता है l
सरकार की गलत नीतियां: आजकल सरकार लोगों को 1 बच्चे के जन्म पर 6 हजार और दूसरे बच्चे के जन्म पर भी 6 हजार रुपये देती है. अब ऐसी नीतियों के माहौल में परिवार नियोजन कैसे सफल होगा?
ज्ञातव्य है कि चीन ने अपनी जनसंख्या पर नियंत्रण के लिए 1 बच्चे की नीति को कठोरता से लागू किया था और जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण पा लिया है, लेकिन इसका भारत उल्टा कर रहा है. मेरे हिसाब से सरकार को 6 हजार रुपये नकद ना देकर पोषण युक्त खाद्य सामाग्री फ्री में देनी चाहिए ताकि बच्चे स्वस्थ पैदा हों l 

जब इन सभी कारणों से जब जनसंख्या वृध्दि होती है तो हमें कई दुष्परिणाम भोगने पड़ते हैं l..जैसे 

देश के संसाधनों पर दबाव: यदि किसी देश में जनसँख्या तेजी से बढती है तो उस देश में मौजूद आधारभूत संरचना और संसाधनों पर दबाव बढ़ता है जिससे कि देश का विकास प्रभावित होता है, और फिर देश गरीबी के कुचक्र में फंस जाता है l 

लोगों के जीवन स्तर में गिरावट: यह तो बिल्कुल सामान्य सी बात है कि जब कमाने वाले कम होंगे और खाने वाले ज्यादा तो लोगों को उनकी शारीरिक जरूरतों के अनुसार भोजन और पोषण नहीं मिल पायेगा फलस्वरूप उनके जीवन स्तर में गिरावट आती जाएगी. भारत में आज भी बहुत से गाँवों में यह सिलसिला जारी है.
गरीबी का दुष्चक्र: यदि किसी के माता पिता गरीब हैं जिन्होंने अधिक बच्चों के कारण सभी बच्चों की ठीक से पढाई लिखाई पर ध्यान नहीं दिया तो ऐसा संभव है कि उसकी आने वाली पीढियां भी इसी चक्रवात में फंसी रहेंगी और गरीब के घर में गरीब पैदा होता रहेगा l 

देश का विकास प्रभावित:   जिस देश के लोग केवल अपने पेट के भरण पोषण में ही लगे रहेंगे वहां विज्ञान और प्रोद्योगिकी के विकास की कल्पना करना भी बेमानी है.यह स्थिति अफ्रीका महाद्वीप के कई देशों मे आज भी देखने को मिलती है l 

भारत भी इस तरह की स्थिति में 70 के दशक में फसा था यही कारण है की भारत की नीति निर्माताओं ने उस समय “हम दो हमारे दो” का नारा दिया था और जनसंख्या नियंत्रण के लिए नसबंदी अभियान चलाया था l 

इस प्रकार स्पष्ट है कि जनसँख्या विस्फोट की स्थिति सभी देशों के विकास में बाधक है l यह एक इस तरह की वृद्धि है जिस पर अल्प विकसित देशों को घमंड करने की वजाय शर्म आती है l 
किसी भी देश के सुरक्षित और प्रसन्नता से भरे भविष्य के लिए सबसे अधिक आवश्यक है पारिस्थितिक आवास। पारिस्थितिक आवास की अवधारणा में उन प्राकृतिक संसाधनों की आवश्यक मात्रा में उपलब्धता निहित है, जो देश की प्रगति के लिए अनिवार्य है, पर जिसका अक्षय विकास पर कोई बुरा प्रभाव न पड़े। दुनिया में हर व्यक्ति को उसके हिस्से का पारिस्थितिक आवास चाहिए, जिसमें वह स्वस्थ-प्रसन्न रह सके, अपनी क्षमता का पूर्ण विकास कर सके और अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित रख सके। पर जनसंख्या विस्फोट वर्तमान के पारिस्थितिक आवास को तो चौपट कर ही रहा है, भविष्य को भी एक अनंत अंधकार में ले जा रहा है। जनसंख्या का विस्तार हमारे पर्यावरण की गुणवत्ता को भी चौपट कर रहा है। पर्यावरण प्रदूषण, रेगिस्तानीतकण, सार्वभौमिक गर्माहट, जलवायु परिवर्तन और जीव-जातियों के विलुप्तिकरण का सबसे बड़ा कारण जनसंख्या विस्फोट ही है।
इसके उलट विश्व में कुछ जापान, रूस और फ़्रांस जैसे देश अपवाद भी हैं.. जहाँ की जनसँख्या वृद्धि नकारात्मक दौर में पहुँच गयी है और वहां की सरकारों को लोगों से जनसँख्या बढ़ाने की रिक्वेस्ट करनी पड़ रही है और कुछ देशों में सरकार के द्वारा एक से अधिक बच्चे पैदा करने पर पैसा भी दिया जा रहा है l दोनों ही परिस्थिति सही नहीं है l 

✍️शालिनी गुप्ता प्रेमकमल 
(स्वरचित)