ये शब्द सुनकर ख्याल आता होगा
एक चट्टान से कठोर व्यक्तित्व का
जिसमें शक्ति और सामर्थ्य होता है
ह्रदय पाषाण के समान भाव शून्य
नहीं होता दया और करुणा का भाव
मूर्ति खड़ी होती होगी आंखों के सामने
अनुशासन और बंदिशों में बांधने वाला
परंतु क्या किसी ने झांक कर देखा उसमें
उसके पाषाण हृदय से छिपे शीतल जल को
चट्टानों की दरार से झांकता स्नेह का पौधा
कड़े अनुशासन के पीछे छुपी हुई चिंता
बंदिशों के साथ साथ कदम से कदम मिलाना
डांट के साथ साथ प्यार के फूल बरसाना
धोखा मिलने पर अंदर ही अंदर टूट जाना
पर बाहर से खुद को मजबूत सा दिखाना
स्त्री के आंसू पोछने का रूमाल बन जाना
खुद दुखी होने पर अंधेरे कोने में छुप के रोना।
क्या इतना आसान है एक पुरुष का पुरुष होना?
पुरुष दिवस पर सभी पुरुष लेखकों को शुभकामनाएं
संगीता शर्मा

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