थमी थमी सी बारिश अभी
मद्धम मद्धम चल रही हवा
खूबसूरत एक ढ़ली ढ़ली सी शाम 
गुलमोहर की सड़कों पर झूमते से वृक्ष, 
पत्तों से छनकर आती बूँदों की सरगम
चांद का उन्मुक्तता से नभपटल पर इतराना
विहंगम का अपने आशियाने में लौटना 
कुदरत ने अपना सौन्दर्य बिखरा दिया था 
चुन कर अपनी अपनी खूबसूरत मुस्कान 
काँटों के बीच भी खिलने का हुनर सीखा रहा 
आफरीन बन गुलिस्तां में खुशबु बिखेर रहा 
क्षण भर में कृत्रिमता को सर्वथा भूल कर 
दिखावे की दुनिया से दूर, स्वयं के साथ ही
स्वयं को हवा के झोंके के साथ छोड़ कर 
सब्ज पत्तों के साथ, पृथ्वी की सुगंध में 
मुस्कान संग खुद में खोकर खुद को पाना है 
आरती झा(स्वरचित व मौलिक) 
दिल्ली
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