यह जो ठहर गया है न तेरे मेरे बीच-
खामोशी नहीं है- रिश्ता है-
जिसे न मैं खत्म कर सकती हूँ न तुम
यह जो उदासियाँ सी थम गई हैं न
तेरे मेरे दरम्यान...
यह वो एहसास हैं जो
या मैं महसूस कर सकती हूँ या तुम
आंखों की नमी जो पलकों के पोरों पर रुकी सी है न-
यह तोहफा हैं मुहब्बत का-
जो न मैं नकार सकती हूँ न तुम
एक बूँद भी जो बरसी तो
मन के सोंधेपन की खुशबू को
अपनी सांसो में या मैं समेट सकती हूँ या तुम
लकीरों से लड़ते हुए
ठहरे से इस रिश्ते में
थमी सी उदासियों के साथ,
पलकों की इस रुकी सी नमी को
अपनी हथेलियों में या मैं समेट सकती हूँ या तुम!
स्वरचित- शालिनी अग्रवाल
जलंधर

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