2122 2122 2122 212

दर्द है आवाम सारी मजहबी दिखने लगी
क्या कहूं तुमसे धरम की बंदगी दिखने लगी।।

जिस्म के संग रूह भी वो बेच बैठें हैं यहां
शहर हो या घर सभी में नाखुशी दिखने लगी।।

क़त्ल होता है सरे बाज़ार अब तो हर पहर 
सूख जाते हैं लहू वो दिल्लगी दिखने लगी।।

मुल्क मेरा दर्द से उभरा है अभी तो और फिर
बदनसीबी की वही सब दरिंदगी दिखने लगी।।

राज अब तो कर रहें सिंह भेष धर गीदड़ यहां,
बेअसर होती दुआयें कीर्ति" की दिखने लगी।।

मौलिक व स्वरचित:- कीर्ति रश्मि "नन्द( वाराणसी)