जब देखती हूँ मैं इस आईने को
तो मुझे मेरा बचपन दिखाई देता है
वो मासूम चेहरा दिखाई देता है
जिसे ना सजने का शोंक था
तो ना हो संवरने का
जब देखती हूँ चेहरे को
तो मुझे मेरा जीवन दिखाई देता है
तब बहुत शोंक हुआ करता था
इस आईने को देखने का
मेरी माँ का भी था मन मुझे दुल्हन बनाने का
कभी लाली,कभी काजल तो कभी
बिंदिया लगाने का
आज जब देखती हूँ आईने को
तो फिर से वही बचपन दिखाई देता है
कभी तितली की तरह इठलाती थी
देख कर उस आईने को
आज फूल की तरह मुरझा जाती हूँ
जब सजती हूँ देख आईने को
क्योंकि आज भी जब देखती हूँ आईने को
तो चेहरे की खूबसूरती नही
मुझे मासूमियत याद आती है
हाँ मुझे फिर वही बचपन दिखाई देता है
अब नफरत सी होती है खुद से
जब भी देखती हूँ आईना
सजना तो मैं भी चाहती थी एक सुहागन बनकर
अब हर रात बनती हूँ मैं एक नई दुल्हन
हाँ इसीलिए मुझे उस आईने से भी नफरत सी हो गई हैक्योंकि चंद पैसों के लिए मुझे यहाँ बेचा था गया
खुद मेरे अपनों ने मुझे एक तवायफ था बनाया
अब जब भी देखती हूँ इस आईने को
मुझे सिर्फ बचपन याद आता है
हाँ मुझे फिर वही बचपन दिखाई देता है
ॐ नमः शिवाय
🙏🙏🙏🙏🙏
कोमल भलेश्वर
यमुनानगर(हरियाणा)

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