ये कैसी विडम्बना है,
एक दहलीज पार करके दुसरी दहलीज पर जाना,
माँ, बाबा की चौखट ही प्यारी है,
वो चौखट ही नहीं हमारी मर्यादा है,
जिसके बिना रहीं नही,
जो रोम रोम में बसा है,
मन का मंदिर है,
सिखा सब कुछ उसी चौखट के अंदर
अच्छे बुरे का ज्ञान कराया,
कितने सारे ख्वाब सजाए,
फिर भी किसी ने न सोचा,
कह दिया पंरपराओ की बेड़ियाँ है,
थाली पूजन करके अपनी दहलीज से विदा किया,
दो दहलीज़ों की लक्ष्मी हू, खुशी देख सबकी
मैंने भी ये मान लिया ,
माँ, बाबा की चौखट छोड़ ,
उस दहलीज को अपना मान लिया ll

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