कितने मासूमियत से भरे थे,
जब आए इस दुनिया में हम भी नादान परिंदे थे।

न कोई भेदभाव था ,न कोई अलगाव था,
सब हमारे अपने थे।

न कोई इच्छा थी न कोई होड़ थी,
सोच साफ थी, अच्छी नियत के वाशिन्दे थे।

फरेब से न कोई वास्ता था, सीधा सच्चा रास्ता था,
  कभी मन्दिर पर जा बैठे कभी मस्जिद बैठे वो परिंदे थे।

ज्यों ज्यों समझना चलना फिरना सीखा,
तब जाना हकीकत में दुनिया के निजाम बहुत गंदे थे।

ऊँची अटारी बाले, बड़ी बड़ी गाड़ी बाले,
देखे साहब, जोर से हंसने बाले सिसकते हुए जिन्दे थे।

खो गए हम भी दुनिया की इस भीड़ में शामिल हुए क्यों,
जब खुद से रु व रु होते सवाल करते वो मन के परिंदे थे।

कैसे उनको समझाते, मासूम परिंदे यहाँ उड़ नही पाते,
कदम कदम पर यहाँ पड़े शैय्यादों के फरेबी फंदे थे।

समझ न पाया मन का मासूम परिंदा लोगों की मुस्कुराहटें,
अपनाइयत का ढोंग थे लोगों को फसाना इनके धंधे थे।

सब कुछ जान समझकर भी गर्क उन राहों पर निकल पड़े,
आँखों के होते हुए भी वो मन की आँख से अंधे थे।

अन्जू दीक्षित,
बदायूँ
उत्तर प्रदेश।