सर्द रातें
आते जाते
उन लम्हों की याद दिलाते,
जिन लम्हों मे थे
बस मैं और तुम,
एक दूसरे की हाथ थामे,
सौंधी सी अग्नि के गिर्द ,
दुनियाँ जहान की करते बातें,
उन मीठे लम्हों की याद दिलाते
जब थे सिर्फ मैं और तुम ।
कितना निश्छल पवित्र
प्रेम था हमारा,
तुममें थी बसती मेरी दुनियाँ
और मुझमें संसार तुम्हारा,
फिर जाने कहां रह गये तुम,
समय की धारा में बह गये तुम,
दुनियादारी में गुम हुए तुम,
कितने हिस्सों में बट गये तुम,
मिलकर ना मिले हम,
अब भी आती हैं सर्द रातें,
उन लम्हों की याद दिलाते,
जब हम हँसते हँसातए,
साथ गाते गुनगुनाते,
जमाने भर की बातें बतियाते,
खयालों के रथ पर सवार हो
ख्वाब सजाते,
दो आंखें अब भी बिछी हैं राहों में,
उन सर्द रातों की सर्द आहों में,
शायद फिर से मिलो तुम ।
,,,,,,,,,,,,डॉली मिश्रा " पल्लवि"✍️

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