बाबुल की दहलीज़ नांगकर ,
 बेटी पराई हो जाती है ।
ससुराल की दहलीज़ पर कदम रखते ही,
 बेटी बहु बन जाती है ।
हर कर्तव्य को पूरे दिल से निभाती है ।
अपनी सिसकियों को अपने अंदर छुपाती है ।
जिस दहलीज़ में बचपन  ग़ुज़रा ,
एक ही पल में छोड़ आती है ।
दूसरे घर दहलीज़ की,
वो शोभा बढ़ाती है ।
हद की लकीर उसके लिये खींच दी जाती है ।
उन बेड़ियों में बंध कर रह जाती है।
ना किसी से कुछ कहती बस ज़िंदा रहती ।
इसी तरह एक औरत की उम्र कट जाती है ।