जाने किस प्रतीक्षा में है खामोश आँखें
वक़्त रोके कब रुका है कोई कितना भी चाहे
किस गम में गुमसुम है खामोश आँखें
उठो,देखो द्वार पर ख़ुशियाँ खड़ी हैं फैलाये बाँहें
बढ़ाकर कदम रोक लो उसे जाने न  पाये...

                  नेहा शर्मा