वैभव और उसके दोस्त हर हफ्ते चलचित्र देखने जाते थे। हर शुक्रवार को वो अपने पास के सिनेमा हॉल में चलचित्र का और वहां बने फूड़ स्टॉल्स पर खाने का मज़ा उठाते थे।

एक दिन वह एक बहुत ही बढ़िया, प्रभावशाली, शिक्षा प्रद चलचित्र देखकर बाहर निकले। उस चलचित्र में भिखारियों की दयनीय अवस्था को दर्शाया गया था। सभी दोस्तों की आंखों में उस चलचित्र को देखकर आंसू थे। 

तभी उनके पास कुछ भिखारी बच्चे इकट्ठा हो भीख मांगने लगे। वैभव ने उन्हें हड़काते हुए कहा,"तुम्हें पता नहीं क्या कि भीख नहीं मांगनी चाहिए? इस सिनेमा में चल रहे चलचित्र को देखो जाकर, पता चल जाएगा सब।" 

वैभव की बात सुनकर बच्चे पहले तो चुपचाप खड़े होकर उसे देखते रहे। फिर उनमें से एक बोला,"भईया जी, यदि हमारे पास इतने पैसे होते कि हम चलचित्र देख सकें, तो हम आज भीख ना मांग रहे होते।" 

उस बच्चे की बात वैभव को अंदर तक चुभ गई। कितनी सच्चाई थी उसकी बातों में। वैभव ने कुछ सोचा और कहा,"ऐतवार को तुम सब अपने और साथियों को भी ले आना और यहां सिनेमा के बाहर मुझे दोपहर बारह बजे मिलना।" 

सब बच्चों ने उससे वादा किया और वहां से चले गए। वैभव के मित्रों को समझ नहीं आया कि वो क्या करना चाह रहा है। वैभव ने अपने मित्रों की जिज्ञासा दूर करते हुए कहा,"आज हमने जो चलचित्र देखा, यदि वो चलचित्र इन जैसे गरीब बच्चे नहीं देख पाएंगे, तो उसका औचित्य ही क्या रह जाएगा। इस चलचित्र में एक ऐसे भिखारी बच्चे की कहानी दिखाई गई है जिसने सब मुसीबतों को पार कर सफलता के नये आयाम स्थापित किए। पर यदि उसकी यह कहानी इन जैसे बच्चे नहीं देख पाएंगे तो क्या फायदा? इसलिए मैं इन्हें उस बच्चे की कहानी दिखाकर प्रोत्साहन देना चाहता हूं। क्या तुम सब मेरा साथ दोगे?" 

"बिल्कुल वैभव। बहुत नेक ख्याल हैं तुम्हारे। हम ज़रुर तुम्हारा साथ देंगे।" वैभव के दोस्तों ने कहा।

तय दिन वो सभी बच्चे अपने कुछ मित्रों के संग वहां पहुंच गए। वैभव और उसके दोस्तों ने उनकी भी टिकट ख़रीदीं और हॉल के अंदर ले गये। हॉल की चकाचौंध देख सब हैरान हो गये‌। पहली बार अपने जीवन में चलचित्र देख, वो भी सिनेमा के विशाल पर्दे पर, सब बाग-बाग हो गये। बहुत चाव से उन्होंने वो चलचित्र देखा। 

चलचित्र खत्म होने के पश्चात वैभव और उसके दोस्तों ने उन सबको अच्छा सा खाना खिलाया। इतना स्वादिष्ट खाना उन्होंने कभी नहीं खाया था। 

खाना खाते हुए वो बोले,"भईया, हम सब आज आपसे वादा करते हैं कि मेहनत करेंगे, भीख नहीं मांगेगा, और उस बच्चे की तरह अपना नाम भी रौशन करेंगे।" 

"ये हुई ना बात। तुम सब कल मेरे घर आ जाना। वहीं सोचेंगे कि क्या करना है।" वैभव बोला। 

सब बच्चे खुशी-खुशी वहां से चल दिए। वैभव और उसके दोस्तों ने मिलकर चलचित्र की उस सोच को सार्थक करने का प्रयास किया। 

अक्सर हम देखते हैं कि बहुत से ज्वलंत विषयों पर चलचित्र बनाए जाते हैं। पर यह संदेश जिन लोगों तक पहुंचना चाहिए वो तो इन्हें देख भी नहीं पाते। 

इसलिए वैभव द्वारा की गई यह पहल यदि हर व्यक्ति करे तो इन चलचित्रों का संदेश पूरे समाज में समान रूप से पहुंच सकेगा। 

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लेखिका
आस्था सिंघल