जब से होश संभाला है । अपने आपको एक ऐसे घर में रहते हुए पाया है । जहां ऊंची आवाज़ में चिल्लाना मना था । कोई भी काम अपनी मर्जी से करना मना था । घर - घर नहीं खेल सकते थे ना छुपन - छुपाई ।क्योंकि जहां हम रहते थे । वहां ये सब खेलना मना था । एक दिन मेरे मंदबुद्धि भाई ने तेज आवाज में गाना लगाकर नाचना शुरू कर दिया । तभी बगल के कमरें सेआती हुई एक बुजुर्ग महिला चिल्लाना शुरू करके गाना बंद करवा दिया । मैंने अपनी मां से पूछा कि , हम यहां अपनी मर्जी से कुछ क्यों नहीं कर सकते । मां ने भरी आंखों से देखते हुए कहा - बेटा हम किराए के मकान में रहते हैं । यह घर किसी और का है हमारा नहीं । इसलिए तुम या मैं अपनी मर्जी से कुछ नहीं कर सकते । जिस दिन हमारा खुद का घर होगा । उस दिन तुम कुछ भी कर सकते हो । तब कोई भी कुछ नहीं कहेगा हमें । ना हमारी बुराई पड़ोस में जाकर करेंगे ना ही किसी चीज को करने के लिए कोई मना करेंगा । अपने सपनों के घर के आस लिए मां इस दुनिया से चली गई । उनके जाने के सालों बाद मैंने अपना सपनों का घर बनवा लिया है । जिसमें मैं जो चाहे कर सकता हूं । जैसे मां कहती थी....मेरे सपनों का घर ।
रचनाकार - श्वेता सोनी

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