ज़िन्दगी की राह पर चलते हुए,
इस कदर उलझे रहे।
सोचने को वक़्त ही न मिला
एक घर अपना भी होगा।
देखे जो स्वप्न, सारे खुली आँखों से,पूरे भी किए सब जान लड़ा कर।
आ समक्ष जो भी पड़ा था सब निभाते चल दिए।
उसे भी तो दिख रहा था जिसने हमें भेजा यहाँ ।
उत्तरदायित्व ही पूर्ण करते रहे,
मेहनत में कोई कोर-कसर न छोड़ी,
मनोबल कभी न टूटा,पीछे मुड़ देखा नहीं ।
शौक की कोई चादर न लपेटी 
ख्वाब बस एक ही नयन में 
जो दो फूल मिले, वो फूलें-फलें ,
सबके सम्मिलित प्रयास औ प्रभु का अद्भुत साथ
चलना, गिरना पड़ना और फिर उठना ,
उठकर दौड़ लगा देना जाना यही
साहस कभी नहीं था छोड़ा।
दुःख-सुख तो जीवन फुलवारी के
रंग रंगीले सजीले फूल ,
वो कैसे विचलित कर सकते?
मन में तो विश्वास अटल हाथों का
प्रभु से मांग लिया वरदान
गलत राह पर झांकी कभी न,
जान दुखाया न दिल किसी का।
आज अपना घर भी है औ गाड़ी भी
और है प्रभु की फुलवारी।
जिसके ख्वाब स्वप्न में भी न थे।
है तो सब प्रभु की ही माया।
बारम्बार करूँ उसे प्रणाम!
                 रचयिता -
             सुषमा श्रीवास्तव