हे प्रिये! तुम्हारी प्रेम साधना कर 
मैने तुम्हे साध लिया है
तुम्हारे प्रेम पथ पर
मैने अखंड परधाम पा लिया है
तुम्हारे नाम रुपी मणको से  
सदैव तुम्हारा सुमिरण किया है
मैने जो निषकाम भाव से 
जो तुम्हारी प्रेम साधना की है,
उसी निष्काम साधना से
मैने तुम्हे और तुम्हारे प्रेम 
दोनो को साध लिया है

हे प्रिये! मै प्रेम साधना मे लिप्त
मीरा बन सदैव तुम्हारा
गुणगान करती हूँ
तुम्हारी प्रेम साधना मे मै
राधा बन सदैव तुम्हारा
इन्तजार करती हूँ 
मेरी साधना के वशीभूत हो
जब तुम मेरे पास खींचे आते हो
हे प्रिये! तब तुम भी मेरी साधना से 
अछूते कहाँ रह जाते हो।
कविता गुज्जर