वैसे तो ठाकुर साहब ने निश्चय किया था कि वह कभी भी अपने बेटों संतोष और प्रेम के घर नहीं जायेंगें। अब उनका जीवन बड़ी बहू संध्या के साथ ही बीतेगा। पर जल्द ही ऐसी स्थिति आ गयी कि उन्हें प्रेम के घर जाना पड़ा। आखिर बेटा कैसा भी हो, पर माता पिता के मन में तो उसके लिये आशीर्वाद ही रहता है। अपने नालायक बेटे की मृत्यु के बाद ठाकुर साहब और जानकी देवी की आंखो से आंसुओं की बाढ ही आ गयी। यह दूसरा मौका था जबकि ठाकुर साहब के सामने उनका बेटा संसार त्याग गया। हालांकि जब बड़ा पुत्र राजीव शहीद हुआ था तब गर्व का क्षण था। जबकि आज क्षण ऐसा था कि उन्हें अनेकों प्रतिकूल आबाजें सुनायी दे रहीं थी।

  पुलिस की जांच में भले ही पूरी बात सिद्ध नहीं हुई। पर कानाफूसी में लोग एक से बढकर एक होते हैं। वैसे भी अब प्रेम और महिमा के संबंध जग जाहिर थे। जब कोई गलत बात एक से दूसरे के कानों में जाती है तब बढती ही जाती है। जहाँ पुलिस की जांच दुर्घटना और आत्महत्या के इर्द गिर्द घूम रही थी, वहीं कुछ लोगों के दिमाग के घोड़े दौड़ दौड़कर इसे प्रेम की हत्या भी कह रहे थे। सभी की दिमाग में कातिल के रूप में भी अलग अलग चेहरे थे। कोई महिमा का प्लान बताता तो कोई सरस्वती को ही षडयंत्रकारी बताता। जबकि एक सत्य यह भी है कि प्रेम की मृत्यु से उन्हीं दोनों को अधिक नुकसान हो रहा था। हालांकि नुकसान के सापेक्ष गणित में महिमा के बजाय सरस्वती ज्यादा दोषी लग रही थी। आखिर प्रेम उसी को तो तलाक देने जा रहा था। ईर्ष्या और लालच में पत्नी भी ऐसा जघन्य अपराध कर सकती है।

   वैसे ऐसे समीकरण जांच करने बाले पुलिस अधिकारियों के दिमाग में न आये हों, ऐसा कैसे संभव हो सकता है। हर रोज अपराध के मामले सुलझाते सुलझाते उन्हें तो वैसे भी शक करने की बीमारी होती है। पर न तो महिमा के काल डिटेल और न सरस्वती के काल डिटेल उन्हें दोषी सिद्ध कर रहे थे।

   जब सब मिट रहा हो तो जितना मिल जाये, उसी को समेट कर निकल लेना ही समझदारी कहा जाता है। फिर महिमा ने तो पहले ही बहुत ज्यादा समेट लिया था। दुखद स्थिति तो सरस्वती की थी। भले ही पति पत्नी के मध्य अधिक प्रेम न था फिर भी एक सामाजिक सहारा तो था। आखिर वह सहारा टूट गया। बच्चों की जिम्मेदारी भी अब अकेले उसके ऊपर आ गयी।

   संतोष और सावित्री भी आये पर अधिक रुक नहीं पाये। खुद की परेशानियों को अधिक व्यक्त करने का समय नहीं था।

   जब अधिकांश रिश्तेदार केवल दिखावा कर रहे थे, उस समय सरस्वती को सबसे अधिक अबलंबन ठाकुर साहब, जानकी देवी और संध्या ने ही दिया। ठाकुर साहब और जानकी देवी तो पूरे कर्मकांड तक सरस्वती के साथ रहे। संध्या भी बीच बीच में आती रही।

  अच्छे लोगों का साथ कुछ ही समय में विचारों को सकरात्मक दिशा में मोड़ देता है। वर्षों तक स्वर्ग के सुख भोगने के स्थान पर कुछ पलों का सत्संग अधिक प्रभावशाली होता है।

   सच्चाई तो यह है कि बुरे क्षण ही मनुष्य के मन में वह शक्ति स्थापित करते हैं कि वह महान लोगों के सत्संग का अर्थ समझ सके। संध्या के साथ ने भले ही उसके भाई, भाभी, माता और पिता के मन पर प्रभाव न छोड़ा हो, पर सरस्वती के मन पर अमिट छाप छोड़ दी। आखिर संध्या ने भी अपने पति के निधन के बाद खुद को सम्हाला था। अपने बेटे की देखभाल की। फिर सरस्वती को भी खुद को सम्हालना होगा। कुछ दिन का सहारा भले ही कोई दे दे। पर अब उसे खुद जीना होगा। अपने बच्चों का खुद सहारा बनना होगा।

  परिवार के सदस्यों के मानस पर जो लोभ की चादर चढी हुई थी, वह नष्ट हो गयी। कुछ दिनों पूर्व ही जो बच्चे माता पिता के झगड़े का भी फायदा उठा रहे थे, अब मितव्ययिता से जीना सीख गये।

   जिंदगी में आगे बढने के लिये सुंदरता के स्थान पर योग्यता और खुद पर भरोसा अधिक महत्वपूर्ण है। जहाँ संध्या में ये दोनों गुण थे, वहीं सरस्वती इन दोनों गुणों से हीन थी।

   वैसे तो प्रेम अपनी अधिकांश जमा पूंजी वासना के खेल में लुटा चुका था। फिर भी उसके जो मद बनते थे, उन्हें सरस्वती को दिलाने में संध्या ने ही पूरी मदद की। वैसे तो संध्या अपने पति के मदों को सरस्वती को दे सकती थी। जिनकी उसे सबसे अधिक जरूरत भी थी। फिर भी पुराने अनुभव ने संध्या को ऐसा करने से रोक दिया। मेहनत की कमाई का अर्थ वही समझता है जो कि मेहनत से कमाता है।

   संध्या के प्रयासों से सरस्वती को भी अपने पति के विभाग में मृतकाश्रित कोटे में नौकरी मिल गयी। हालांकि सरस्वती की शैक्षिक योग्यता को देखते हुए उसे बहुत छोटे पद पर ही नियुक्ति मिल पायी। 

   सरस्वती को संध्या के खिलाफ भड़काने में अनेकों ने अपनी जी जान लगा दी। एक अधिकारी की पत्नी को चपरासी की नौकरी दिलाकर संध्या वास्तव में सरस्वती का अपमान ही कर रही है। यदि संध्या को सरस्वती की मदद करनी है तो उसके पास राजीव का अच्छा खासा मद है। आखिर राजीव भी तो इसी परिवार का लड़का था। उसका धन इसी परिवार में प्रयोग होना चाहिये। 

   अपनी बड़ी बहू का हर तरह से साथ दे रहे ठाकुर साहब की भी समाज में बहुत आलोचना हो रही थी। देखो... ।यह भी एक पिता हैं। इनकी पुत्रवधू संकट में हैं। और ये खुद अपनी विजातीय पुत्रवधू का साथ दे रहे हैं। राजीव का पूरा का पूरा मद केवल संध्या का तो नहीं है। 

   लोकापवाद किसी के भी मन को विचलित कर सकता है। पर किसी का भी मन विचलित नहीं हुआ, इसे केवल ईश्वर की कृपा ही माना जायेगा। 

   मेहनत की आय से ऐशोआराम भले ही न मिलें पर रोटी अवश्य मिल जाती है। अब सरस्वती भी मेहनत कर रही थी। गलत कमाई का दुष्प्रभाव सामने था। उसके बच्चों का चरित्र बनाने की जिम्मेदारी अब उसी के ऊपर थी। और सरस्वती नहीं चाहती थी कि उनके बच्चों के जीवन में इन घटनाओं की पुनरावृत्ति हो। 

  क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'