अद्भुत है माँ प्रकृति
एक माँ की दो संतान
एक पशु /पक्षी और एक इंसान,
कैसा है कलयुग
हो रहा अनर्थ
मूक पशुओं पर मनुष्य
कर रहा कुकृत्य
क्या दोष है उनका
बारूद जो खिलाया गया
कभी अपने स्वाद की खातिर
तशतरी में परोसा गया
कभी अपने मनोरंजन के लिए,
जैसा चाहा वैसा नचा लिया,
मूक होते है वो,
प्यार के भूखे,
फर्क मनुख और जानवर में केवल
मस्तिष्क के उपयोग करने की क्षमता के अनुपात का,
तार्किक शक्ति के अनुसार जीवन शैली के प्रकार का,
किन्तु सत्य यह भी अब
इंसान ही जानवर हो चला,
जानवर को निर्जीव समझ
क्रूरता है कर रहा...
किन्तु अब बदलना होगा,
समाज को समझना होगा
पशुओं को भी जीवन का
अधिकार है, यह सब समझना होगा,
नहीं कोई अन्याय हो,
ना कोई पशु को अपंग करे
ना कोई पशुओ का खेल हो
ना कोई बलि दी जाये
ना कोई परीक्षण का सामान बने
दंडनीय अपराध यह,
ना कोई जानवर सताया जाये
ना इन्हे मनोरंजन का साधन बनाया जाये
हो पालन कानून का
अन्यथा दंड कठोर दिया जाये।
निकेता पाहुजा
रुद्रपुर उत्तराखंड

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