बाबुल इस घर स यादों की बारात ले चली।
आँखो में सजाकर सपने हज़ार ले चली।
यादों इस घर की रखूँगी संजो दिल में।
आएँगी याद अक्सर ये मुझे तन्हाइयों में।
जी लूँगी इनके साथ यहाँ बिता पल जो चली।
बाबुल इस घर से यादों की बारात ले चली।
गुड़िया की शादी कर सीख देती थी बहुत।
ससुराल में रहेगी कैसे सिखाती बहुत।
सीखों को आज मन में अपने उतार चली।
बाबुल इस घर से यादों की बारात ले चली।
चली पिया के देश संस्कार लिए साथ में।
साथ बिताए क्षण आपलोगो के साथ में।
माँ की सभी सीखों को बाँध गाँठ ले चली।
बाबुल इस घर से यादों की बारात ले चली।
आँखो में तेरे आँसू क्यूँ बहते बाबुल।
आती रहूँगी मिलने दुखी मत करो ये दिल।
होती बेटियाँ पराई समझा के ये चली।
बाबुल इस घर से यादों की बारात ले चली।
पड़ता है सभी को जगत के रसम निभाना।
चाहती नहीं मैं आप सब से दूर जाना।
मुश्किल की घड़ी ये रखकर धीरज मैं चली।
बाबुल इस घर से यादों की बारात ले चली।
चांदी की पायल लाये जब आप पहली बार।
छनकाती थी पहन कर घर आँगन अरु द्वार।
माँ से माँग उसे मैं बचपन साथ ले चली।
बाबुल इस घर से यादों की बारात ले चली।
जाती डोली आज मेरी इक नए घर में।
बस जाउँगी वहाँ होंगे पूरे कर्म अपने करने।
अर्थी भी उठे वहीं से अरमान ले चली।
बाबुल इस घर से यादों की बारात ले चली।
स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह'

0 टिप्पणियाँ