जीवन एक समर है तो इस समर में आगे बढने बाले को योद्धा ही कहा जायेगा। हालांकि बहुत कम लोग विपरीत परिस्थितियों में अपना धैर्य सम्हाल पाते हैं। ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास या अविश्वास किया जा सकता है। यह सभी की अलग अलग सोच होती है। पाप और पुण्य के विषय में भी विभिन्न विचार स्वीकार किये जाते हैं। फिर स्वर्ग और नरक की अवधारणा में भी अनेकों राय हो सकती हैं। पर एक निर्विवाद सत्य यह है कि जीवन समर को जीतने के लिये अपने कर्तव्यों का पालन करना आवश्यक है। जो अपने कर्तव्यों के प्रति लापरवाह होते हैं, वे इस जीवन समर की विषम परिस्थिति में समझ ही नहीं पाते कि उन्हें क्या करना है। फिर उनके सामने एक ही मार्ग बचता है। कायरता रूपी अधर्म को अपनाकर वे संसार के समर से पीठ दिखाकर भाग जाते हैं। यह दूसरी बात है कि जब वह योद्धा से भगोड़ा बन रहे होते हैं, उस समय भी वह अपनी वीरता के अभिमान में चूर होते हैं।
महिमा और सरस्वती के मामले में महिमा के कम पड़ने की कोई बजह ही नहीं थी। वास्तव में वह प्रेम पर अपना पूरी तरह से अधिकार कर चुकी थी। ऐसी मजबूत स्थिति में उसके कमजोर पड़ने का कोई अर्थ न था।
सरस्वती भले ही अनेकों तरीकों से कमजोर लगती। पर यथार्थ में उसकी भी एक विशेष ताकत थी। वही प्रेम की विवाहिता पत्नी थी। जब तक उसके पास यह अधिकार है, वह कैसे कमजोर है। वास्तव में महिमा के पास यही कमजोरी थी। इसीलिये तो वह भी यही अधिकार चाहती थी। दूसरी तरफ सरस्वती जानती थी कि एक बार उसने यह अधिकार छोड़ा तो वह कहीं की नहीं रहेगी। अपने अधिकार की रक्षा के लिये वह पूरी तरह तत्पर थी।
दोनों बच्चों के लिये इस बात से बहुत फर्क नहीं पड़ता था। ऐसे समय में वह भी अपने पापा से, मम्मी से और तो और उनकी मम्मी का स्थान लेने की इच्छा रखने बाली महिमा से भी अपना रोज का मतलब हल कर रहे थे। लक्ष्मी देवी के उपासक परिवार का सदस्य होने के कारण उनकी मांगे भी बढती जा रही थीं। हालांकि कम आयु के कारण बहुत बड़ा सोचने की उनकी क्षमता न थी। वे दोनों अच्छी जेबखर्च तथा आजादी की मांग कर अपने में खुश थे। दोनों ही अपनी पढ़ाई के लिये लापरवाह होते जा रहे थे। पर दोनों पर नजर रखने के लिये कोई न था। बच्चों की चिंता तो तब होगी जबकि बड़ों को खुद के संघर्षों से फुर्सत मिले।
प्रेम, सरस्वती और महिमा के त्रिकोणीय समर में प्रेम को बार बार हथियार बनाया जाता। अपने अपने प्रेम की दास्तान सुनायी जातीं। वास्तव में वे तीनों ही प्रेम का अर्थ भी नहीं जानते।
" तुम मुझे धोखा कैसे दे सकते हों। जानते हों कि तुम्हारे प्रेम में मैं अपने परिवार और समाज से भी लड़ गयी थी। मेरा विवाह तो तुम्हारे ही चचेरे भाई सोहन के साथ हो रहा था। बड़ी दुख की बात है कि मेरे प्रेम का मुझे यह प्रतिफल मिला। आज तुम एक लड़की के लिये मुझे छोड़ने जा रहे हों। मुझपर तलाक का दबाव बना रहे हों। "
प्रेम भी सरस्वती को अपने प्रेम की दुहाई देता।
" सत्य है कि मैंने केवल तुम्हीं से प्रेम किया है। आज भी मेरे मन में बस तुम ही हों। पर परिस्थिति ऐसी बन गयी है। विश्वास करो कि मैं तलाक के बाद भी तुम्हारा ध्यान रखूंगा। "
प्रेम के उत्तर पर सरस्वती घायल सिंघनी की भांति दहाड़ने लगती।
". विश्वास और तुमपर ।यदि तुम विश्वास के काबिल होते तो आज यह नहीं हो रहा होता। मैं अपना अधिकार किसी को देने बाली नहीं हूं। यह तुम्हारी बेबकूफी है। इससे तुम्हें कैसे निपटना है, यह तुम जानो। "
प्रेम लूटा पिटा सा मुंह लेकर रह जाता।
दूसरी तरफ महिमा के सामने भी यही नाटक होता।
" अरे। मैं तो तुम्हें सच्चा प्रेम करती थी। तभी तो तुम्हें कभी रोका नहीं। अपना पवित्र शरीर भी तुम्हारी आराधना में लगा दिया। मुझे क्या पता था कि मैं जिसको देव समझकर आराधना कर रही हूं, वह वास्तव में दानव है। यदि तुम्हारा प्रेम सच्चा है तो मुझे अपनाने में झिझक कैसी। "
" मैं तुम्हें अपना तो रहा हूं। "
" इस तरह अपनाना। मैं कोई रखैल नहीं बनूंगी। तुम्हारी पत्नी बनना है मुझे। कानूनन पत्नी। मेरे अधिकार के मध्य में तुम्हारी पत्नी बैठी है। "
" मैं उसे समझा तो रहा हूं ना। "
" तुम्हें जो करना है, करो। मुझे मेरे प्रेम का अधिकार चाहिये। मेरा प्रेम अधिकार से आरंभ होकर अधिकार पर भी समाप्त होता है। तुम्हारी फिदरत मेरी समझ में आ चुकी थी। इसीलिए अपने प्रेम के क्षणों के कुछ प्रमाण तैयार हैं। यदि आवश्यक हुआ तो कानून से भी मैं सहायता लूंगी। "
खुद के रचे चक्रव्यूह में प्रेम को फसना ही था। पहले अपने चचेरे भाई की जिंदगी तवाह की। अपने जीवन में कितनी ही लड़कियों को सब्जबाग दिखाकर उसने अपवित्र किया था। कितनों की उम्मीदों को उसने तोड़ा था। आज एक ही बार में जीवन समर के ऐसे चक्रव्यूह में वह फस गया कि फिर संघर्ष करने के स्थान पर उसने रण से भाग लेना ही उचित समझा।
वैसे प्रेम की मृत्यु की पहेली आत्महत्या और दुर्घटना के फेर से कभी निकल नहीं पायी। मृत्यु से पूर्व उसने काफी शराब भी पी थी। ऊंचे पुल से उसका गिर जाना भी अप्रत्याशित न था।
प्रेम तो अपने पथ पर चला गया। प्रेम महिमा और सरस्वती दोनों के लिये सोना देने बाली मुर्गी था। और सोना देने बाली मुर्गी की मृत्यु पर निश्चित ही मन में शोक होता है। प्रेम के शव के पास दोनों का उच्च स्वर में रुदन किसी को भी व्यथित कर सकता था। पर इस रुदन में भी प्रेम न था।केवल स्वार्थ था।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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