तू ही राम है,
  तू रहीम है...
तू ही अल्हा भी है,
  तू ही फ़कीर है...

तू ही अनादि है,
  तू ही अंत है...
तू ही कृष्ण है,
  तू ही कंश है...
तू ही राम है........

क्षण प्यास कुन्द्र..मीठा जल तूही,
  रुद्र रुप तेरे प्रकोप है...
संज्ञान लेता..अनंत रुप तेरे,
  नव ख्याति अम्बर विस्तार है...
तू ही राम है........

मैं प्रकाश की इस जोत में,
  उल्झन चिंता में डूब रहा...
संतन् सी सदमार्ग दे,
  करुणा ही व्याप्त होता जा रहा...
तू ही राम है........

ऐ मेरे मालिक बता,
  क्यों ऐसा यह संसार है??
एक-दूसरे लोग जलता है,
  आपरूपी लेता यह हथियार है...
तू ही राम है........

एक आश तुमसे करता हूँ,
  लौटाले इस निर्माण को...
अलौकिक सुगंध से मनमुग्ध कर,
  अद्भुत तू रचनाकार है...
तू ही राम है........


       ✍️ विकास कुमार लाभ
                मधुबनी(बिहार)