वो जो अल्हड़ सी मुस्काती थी वो लड़की,
जाने कहाँ गुम है,
वो जो अनोखी सी चमक थी उसकी आँखों में
उन्ही आँखों में जाने कैसी नमी है,
वो ओस की बूंदो सा ठहराव लिए जीती थी,
कुछ गुमसुम सी है,
वो जिसके मुस्कराने में तुम्हारी ख़ुशी थी,
जाने उसकी मुस्कान कहाँ गुम है,
वो अल्हड़ सी शरारती,
सजना संवरना भाता था जिसे तुम्हारे लिए,
बदहवास सी मिलती है वो आजकल
वो जो तेरी आगोश में आकर चैन की नींदे लिया करती थी,
ना जाने कितनी रातों से खुद में सिमटी जागी है,
वो अल्हड़ सी चहचहाती तुम्हें अपनी दुनिया मानती वो लड़की,
उसी दुनिया के बिना अधूरी सी है वो लड़की
तुम्हारी ख़ुशी में खुश
तुम्हारी उदासी में उदास होने वाली वो लड़की,
हरपल उदास सी रहती है,
सुधबुध खोयी, दिन रैन भूली
वो पागल सी भोली लड़की,
माना कि सबकुछ है उसके पास
तेरे बिन बहुत अधूरी सी है वो अल्हड़ सी लड़की
निकेता पाहुजा
रुद्रपुर उत्तराखंड

4 टिप्पणियाँ