सुख और दुख आते और जाते हैं। जैसे दिन के बाद रात है, जैसे सुबह के साथ शाम भी है, जैसे पुष्प के साथ कांटे भी हैं। इसी तरह जिंदगी भी विभिन्न परिस्थितियों का संगम है।

   न जाने यह भ्रम क्यों और कैसे बढता गया कि भगवान के भक्तों को दुख नहीं होता है। ईश्वर अपने भक्तों का दुख हर लेते हैं । जबकि सत्य तो यही है कि खुद विभिन्न अवतारों का जीवन पथ अनेकों कष्टों से भरा रहा है।

  अक्सर लोभ में सत्य बात छिपा ली जाती है। चाहे धर्म गुरु हों या मंदिरों के पुजारी। हमेशा वही बताते हैं, जिससे कि उनका मतलब हल हो। भगवान श्री कृष्ण ने अपने मुख से जिस तितिक्षा के सिद्धांत को श्रीमद्भगवद्गीता में प्रतिपादित किया था, उस तितिक्षा सिद्धांत का सबसे ज्यादा हनन धर्म के रक्षकों ने ही किया है। वास्तव में धर्म तो वह आचरण हैं जिन्हें धारण कर कोई भी मनुष्य जीवन के पथ पर आगे बढता है। जहाँ सत्य, अहिंसा, करुणा, मानवता आदि धर्म सार्वभौमिक धर्म कहे जाते हैं। वहीं विशेष परिस्थितियों में धर्म का स्वरूप भी बदलता है। देश की रक्षा को तैनात एक सिपाही कभी भी अहिंसा धर्म का पालन नहीं कर सकता है। दूसरा पहलू यह भी है कि उसी के कारण अनेकों अहिंसा धर्म का पालन करने में सक्षम होते हैं। 

  किसी भी भाव से जो ईश्वर की एक बार उपासना करते हैं, ईश्वर उसे छोड़ते नहीं है।भले ही सांसारिक दृष्टि से उसके लिये अनेकों कठिनाइयां उपस्थित करें, पर उसे सही आध्यात्मिक मार्ग पर जरूर ले जाते हैं। 

  भले ही संतोष और सावित्री की भक्ति केवल पाखंड थी। भगवान के दर पर चढावा भी वे कपट बुद्धि से ही चढाते थे। उस पर भी ईश्वर उनपर कृपा कर रहे थे। कठिनाइयों के माध्यम से उन्हें सचेत कर रहे थे। जीवन का सत्य समझा रहे थे। 

   बुरे समय में वे बातें भी समझ में आ जाती हैं जिन्हें अच्छे समय में कभी नहीं सोचते। गलत तरीकों से धन अर्जित करने में क्या उन्होंने किसी को पीड़ा नहीं दी। किस किस ने कैसी मजबूरियों में उन्हें रिश्वत दी थी। 

  जिन ठेकेदारों ने बड़ी रिश्वत दी थीं क्या उन्होंने अपना काम पूरी जिम्मेदारी से किया। मानक से नीचे बनी सड़कों पर हुए हादसों में कितनों ने अपने प्राण गंवाये। कितनों का सुहाग के उजड़ने में वही तो हेतु थे। कितने बच्चे उन्हीं के कारण अनाथ हुए थे। कितनों के रुदन में उन्हीं के लिये अप्रत्यक्ष रूप से आह निकली होगी। 

   संतोष और सावित्री के मन में ऐसी उदारता पूर्ण बातें आना और पूर्व कर्मों के लिये पश्चाताप होना सचमुच ही आश्चर्य की बात हुई। संतोष और सावित्री के सामने दो उदाहरण थे। एक उसका छोटा भाई प्रेम जो कि गलत कमाई से पतन के ऐसे दलदल में फंसा जिसने उसके जीवन का ही अंत कर दिया। दूसरा उसकी भाभी संध्या जो कि अनेकों मुसीबतों के बाद भी नहीं टूटी। आज भी अपने पथ पर आगे बढ रही है। 

  संध्या और संतोष की भाभी... । कुछ समय पूर्व तो पिता द्वारा संध्या को अपनाने से ही संतोष का मन विदीर्ण हुआ था। परिवार के मान सम्मान के खातिर वह अपने पिता का भी विरोध कर रहा था। आज उसी संध्या को संतोष अपनी भाभी मानता था। 

  कहानी में जब सब अच्छा अच्छा होने लगे तब उसे सुखद कहानी कहा जाता है। हालांकि इस सुखद होती जा रही कहानी के दुखद पन्ने कुछ ज्यादा ही दुखद हैं। 

   मंत्री जी की कृपा से विशेष पदोन्नति पाकर संतोष पहले ही अनेकों अधिकारियों की आंखों की किरकिरी बन चुका था। फिर जब बड़े अधिकारियों को मौका मिला तब उसका उन्होंने पूरा फायदा उठाया। वैसे भी विभाग के किसी राज से भला कौन अपरिचित था। संतोष द्वारा संचालित अनेकों परियोजनाओं की विभिन्न तरीकों से जांच होने लगी। पूर्व के उसके कई कार्यों में ढूंढ ढूंढकर कमियां तलाशी गयीं। रही बची कसर सी बी आई के छापे ने पूरी कर दी। वैसे सी बी आई के छापे के पीछे भी वही वरिष्ठ अधिकारी थे। 

  जिन वैशकीमती गहनों पर सावित्री इतराया करती थी, वे सारे गहने सी बी आई के कब्जे में थे। घर में संचित रिश्वत की नगदी भी उन्होंने जब्त कर ली। और तो और संतोष की अनेकों अचल संपत्ति के दस्तावेज भी सी बी आई के कब्जे में थे। 

  फिर एक जैसे दिखने बाले पर कार्यक्षेत्र में थोड़ा थोड़ा अंतर बाले आयकर विभाग, भ्रस्टाचार निरोधक विभाग, इंटेलीजेंस व्यूरो विभाग की भी जांच चलती रहीं। 

   संतोष ने एक बार फिर से मंत्री जी की कृपा पाने की कोशिश की। पर इस बार कुछ भी नहीं हो पाया। अधिकारी हों या नेता, उनकी कृपा तो खुद को ऊपर बढने के लिये सीढियों का निर्माण करना ही है । सीढियाँ तो उनके ऊपर बढने का साधन हैं। ऊपर चढे हुआ शायद यही समझता है कि उसे कभी भी नीचे नहीं उतरना होगा। फिर जिसका प्रयोग किया गया था, उसकी चिंता करने का कोई अर्थ नहीं रहता। 

    डूबते को सहारा तभी दिया जाता है जबकि बचाने बाले को पूरा विश्वास हो कि वह बचाने के प्रयास में खुद नहीं डूबेगा। संतोष की स्थिति तो उस डूबने बाले की थी जिसका खुद डूबना तो तय है ही, बल्कि वह बचाने बाले को भी डुबा देगा। छोटों की कुर्बानी देकर बड़े को बचाने की पुरानी परिपाटी है।

   लगता है कि संतोष और सावित्री के साथ बहुत ज्यादा बुरा हुआ। दूसरी तरफ यह भी लगता है कि संतोष और सावित्री के साथ बहुत अच्छा हुआ। शायद अब उनपर ईश्वर की पूरी कृपा हो रही है। ईश्वर जिन्हें अपना समझते हैं, उससे सब कुछ छीन लेते हैं। एक बार पूरी तरह मिटकर अब दोनों का मानस उस पवित्रता को स्पर्श कर रहा था जो कि उनकी जीवन को सही राह दिखायेगा। 

क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'