हे आदि शक्ति,
हे दिव्य पुंज,
मैं मौन प्रार्थना करती हूं,
मानव,मानव से प्रेम करे,
मन की बर्बरता का दमन करो,
हृदय प्रेम का मंदिर हो,
मन की ईर्ष्या का नाश करो,
सबके हृदय में त्याग भरो,
सबका मन तुम निर्मल कर दो,
फिर से गीता का ज्ञान बांट कर,
सबको सदमार्ग दिखा दो तुम,
मानवता का धर्म बता दो,
प्रेम उसे करना सिखला दो,
जिस पल हृदय कलुषित भावों का,
मन से त्याग की सोचेगा,
उस पल पशुता छोड़कर,
मानव फिर से मानव बन जाएगा,
है ईश्वर!! मेरी मौन प्रार्थना ,
बस इतना कर दो तुम,
इस राम कृष्ण की पावन भूमि को,
फिर से सुन्दर उपवन कर दो तुम,।
डॉ कंचन शुक्ला
स्वरचित मौलिक

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