कुछ साथ लम्हे गुजार लें, इक शाम अपनी संवार ले।
खामोश अहसास हो चले, चल फिर तुझे तो पुकार लें।

इक  चोट तेरे  वजूद को,   इस राह पर है अगर मिली।
ये तल्खियों की वज़ह ज़रा, दिल की जमीं से उतार लें।

कुछ  चाहतें  हैं  पली हुई,  हो खूबसूरत सा आशियां।
है ख्वाब दोनो दिलों का इक, इस जिंदगी से उधार लें।

आंखों कि आंखों से बात हो, फिर प्यार की इक तो रात हो,
आगोश  में भर के  चाहतें,   इक दूसरे को निहार लें।

ये  नेमतें  इश्क  है  हमें,  दुश्वारियां  भी  जरूर हैं।
ये मांगते हैं दुआ खुदा, उन मुश्किलों से उबार लें।

"बेफिक्र" जज़्बात आज हैं, इक प्यास जगने लगी अभी।
ये शबनमी रात की नमी, अपने लबों पे संवार लें।
221 22 1212 / 221 22 1212 

~रंजन लाल "बेफिक्र" ✍️