गुप्त रूप से किसी भी प्रकार की जानकारी हासिल करने वाले को जासूस कहते हैं। ऐसे कृत्य को करने की विधा जासूसी कहलाती है।
गुप्तचर्या या गुप्तचरी गुप्तचरों और भेदियों द्वारा किया जाता है। विशेषकर युद्धकाल में सब देश अपने भेदियों को भेजकर दूसरे देशों की सेना, सरकार, उत्पादन, वैज्ञानिक उन्नति आदि के तथ्यों के विषय में सूचना प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं। इसे चारवृत्ति, चर कार्य या गुप्तचरी या खुफियागिरी या जासूसी भी कहते हैं। ये सरकारी और गैर सरकारी दोंनो प्रकार के होते हैं। 
आइए हम छोटे-छोटे बच्चों के जासूसी करतब एक छोटी सी कहानी के माध्यम से देखते हैं  ~  👉 सर्दियों के दिन थे। विद्यालयों का शीतकालीन अवकाश चल रहा था। मदन और मालती ने ट्यूशन से आकर जैसे ही घर में प्रवेश किया कि उन्हें घर के बाहर बरामदे में एक चटाई पर दादाजी बैठे दिखे। उन्हें किसी काम में तल्लीन देखकर दोनों ठिठककर वहीं रुक गए। मालती ने कुछ कहना चाहा तो मदन ने होंठों पर अँगुली रखकर चुप रहने का इशारा किया। दोनों बरामदे के बाहर रखी कार के पीछे छुप कर यह जानने का प्रयास करने लगे कि चटाई पर बैठे दादाजी आखिर क्या कर रहे हैं?उन्होंने ध्यान से देखा कि दादाजी ने डस्टबिन का कचरा एक अखबार के ऊपर पलट रखा है और उस कचरे में से कुछ सामान बीन-बीन कर वे एक स्टील की प्लेट में रखते जा रहे हैं। डस्टबिन वहीं बगल में लुढ़का पड़ा है। मालती ने धीरे से पूछा कि दादाजी यह क्या कर रहे हैं।
     दादाजी शायद कचरे में से ऑलपिन बीन रहे हैं। मदन ने धीरे से बोला। स्टील की प्लेट में ऑलपिन गिरने से हल्की-सी खन्न की आवाज आ रही थी। फिर बच्चों ने देखा कि दादाजी पुरानी कापियों के फटे पन्ने भी उठाकर उनकी तह ठीक करके एक के ऊपर एक रखते जा रहे हैं।मालती ने  दादाजी को टोकना चाहा किंतु मदन ने फिर उसे रोक दिया।  वह बोला- आज हम छुप कर देखेंगे कि आखिर दादाजी इन ऑलपिनों और पुराने पेजों का क्या करने वाले हैं। मदन ने देखा कि दादाजी डस्टबिन के उस कचरे में से स्टेपलर पिन के बचे हुए टुकड़े भी प्लेट में रख रहॆ हैं।दोनों बच्चे धीरे से कमरे के भीतर आ गए, जैसे उन्होंने कुछ भी नहीं देखा हो। उन्होंने ठान लिया था कि आज दादाजी की जासूसी क‌रके ही रहेंगे।
   भोजन के बाद दादाजी अपने कमरे में चले गए और पुरानी कापियों के फटे-पुराने पन्नों को कैंची से काट कर सुडौल आकार देकर चौकोर बनाने में जुट गए।बच्चों ने बाहर की खिड़की में अपना अड्डा बना लिया था, जहाँ से दादाजी साफ दिखाई दॆ रहे थे। मदन और मालती इधर-उधर की बातें करते रहे, कभी ट्यूशन की, कभी अपने-अपने दोस्तों की ताकि दादाजी को आभास न हो सके कि उन पर नजर रखी जा रही है। एक घंटे के भीतर उन्होंने कागजों की छोटी-छोटी आठ दस कॉपियां बना लीं थीं और स्टेपलर से पैक कर‌ दिया था। कहीं-कहीं ऑलपिनों का भी उप‌योग कर लिया था।दोनों बच्चे उत्सुक थे कि देखें दादाजी उन कापियों का क्या करते हैं। फटे-पुराने कागज तो डस्टबिन से निकाल कर नगर‌ पालिका की कचरा गाड़ी में डालने के लिए होते हैं, फिर दादाजी ये कौन-सा तमाशा कर रहे हैं। आज बच्चों की नजर सिर्फ दादाजी पर थी। वे दूसरे सभी काम कर तो रहे थे पर ध्यान रह-रह कर दादाजी की ओर ही जा रहा था।
   शाम को दादाजी घूमने के लिए निकले। बच्चों ने देख लिया था कि दादाजी ने वह छोटी-छोटी कापियां एक छोटे से थैले में रख ली हैं और कुछ चाक‌ एवं पेंसिलों के टुकड़े भी। शायद यह भी सब डस्टबिन के कचरे से ही एकत्रित किए हैं। चलते-चलते दादाजी सीधे  बस्ती से ही लगी हुई झोपड़पट्टियों की तरफ मुड़ गए और एक झोपड़ी के सामने जाकर रुक गए। पहले से ही वहाँ उपस्थित चार-पांच बच्चों ने उन्हें घेर लिया। दादाजी आ गए, दादाजी आ गए, कहते हुए उन्होंने अपने हाथ ऊपर कर दिए जैसे उनको पता हो कि दादाजी आज कुछ सामान बांटेंगे। दादाजी ने अपने थैले से कॉपियां निकालीं और‌ उन बच्चों को बाँटने लगे और चाक और पेंसिलों के टुकड़े भी बच्चों को वितरित करने लगे।
      दादाजी हमें भी, दादाजी हमें भी बच्चे हाथ बढ़ा-बढ़ा कर चाक और पेंसिलों को ले रहे थे। दादाजी हँसते हुए सामान बाँट कर प्रसन्न हो रहे थे। अचानक मदन और मालती जो उनका चुपके-चुपके पीछा कर रहे थे उनके सामने प्रकट हो गए। मालती जोर से चिल्लाई दादाजी, मदन भी जोर से चिल्लाया दादाजी आप यहाँ क्या कर रहे हैं? दोनों को अचानक सामने पाकर दादाजी अचम्भित रह गए। फिर ठहाका मारकर जोर से हँसने लगे। हाँ, तो तुम लोग दादाजी का पीछा कर रहे थे। उन्होंने हँसते - हँसते मदन के कान पकड़ लिए। दादाजी हम लोग जानना चाहते थे कि आप कचरे में से क्या एकत्रित करते हैं और क्यों?आज आपकी पोल खुल ही गई। दादाजी आप फटे-पुराने कागज क्यों इकट्ठे करते हैं, यह कचरा तो बाहर फेंकना चाहिए। मालती ने कहा। नहीं बिटिया! दुनिया में प्रत्येक चीज की कीमत होती है। जो सामान हम बेकार समझ कर फेंक देते हैं वह दुनियाँ के सैकड़ों-हजारों बच्चों के काम आ सकते हैं। ऐसे कितने बच्चे हैं जो थोड़ा-सा भी सामान बाजार से नहीं खरीद सकते। कहते हैं बूँद-बूँद से सागर भर जाता है।
    ऐसे ही फेंके जाने वाले तथा कथित फालतू सामान से न‌ जाने ‍कितने बच्चों का भविष्य बन सकता है। एक-एक ईंट जोड़कर मकान बनता है, तिनके-तिनके से रस्सी बन जाती है, वह बड़े-बड़े भारी-भरकम सामान को उठा लेती है। वैसे ही यह छोटे-छोटे हमारे व्यर्थ के सामान देश-दुनिया की बड़ी आबादी के काम आ सकते हैं। मदन तुमने जो कॉपियां गुस्से में फाड़ दी थीं, उनको काम लायक बनाकर मैंने इन बच्चों में बाँट दिया। देखो कितने खुश हैं यह बच्चे। स्टेपलर पिन‌ के टुकड़े चाक-पेंसिलों तुम लोग रोज फेंकते हो, देखो आज किसी के काम आ रहीं हैं। मदन बोला - सॉरी दादाजी हम लोग छोटे बच्चे हैं अभी यह सब नहीं जानते। हमको माफ कर दीजिए दादाजी। आगे से ऐसी गलती नहीं करेंगे। और हमारी जासूसी? जोर से हँसते हुए दादाजी ने पूछा। नहीं करेंगे, नहीं करेंगे, हम जासूसी नहीं करेंगे।'दोनों बच्चों ने एक-दूसरे के हाथ में हाथ फँसा कर और हाथ ऊपर करते हुए नारा लगाया और दादाजी से लिपट गए ।
           लेखिका --
            सुषमा श्रीवास्तव 
             मौलिक रचना