कभी बडप्पन के अहंकार में एक मनुष्य किसी दूसरे मनुष्य को मनुष्य ही नहीं मानता है। उससे ढंग से बात भी नहीं करता है। उसके जायज मांगों की भी अवहेलना करता है। काल अपनी चाल इस तरह चलता है कि बड़े को छोटा और छोटे को बड़ा बना देता है। फिर पूर्व का बड़ा जो अपमानित करने में अपनी मर्यादा भी ध्यान नहीं रखता है, अब चापलूसी की सीमा भी भूल जाता है।

  कभी जो पी डब्लू डी के आफिस में अपने बिलों के भुगतान के लिये चक्कर लगाता था, वह सत्तो अब सत्तो नहीं रहा। वैसे वह सत्तो कभी था भी नहीं। गरीब और अमीर का नामकरण हमेशा अलग होता है। परशुराम निर्धनता की स्थिति में परसा बन जाता है।

   कुछ सरकार की योजना, विभिन्न सरकारी प्रोजेक्टों में कुछ कार्य निचले स्तर के ठेकेदारों को दिये गये। वैसे सरकारी अधिकारियों की मर्जी तो बिल्कुल नहीं थी। पर सरकारी नियम का पालन करने के बंधन के कारण सत्यदेव को भी एक छोटी सड़क के निर्माण की जिम्मेदारी मिल गयी। अनुभवहीन सत्यदेव ने सड़क निर्माण में कोई कौताही नहीं की। आशा थी कि अच्छे काम के बाद आगे भी काम मिलेगा। जीवन आगे पटरी पर चलेगा। पर ऐसा हो नहीं पाया। सत्तो द्वारा किया गया अच्छा कार्य भी खराब माना गया। आखिर खराब था ही। बिल प्रस्तुत करने के साथ लिफाफा भेंट करने की परंपरा से सत्तो परिचित न था। वैसे यह भी कौन सा पढाने का विषय है। मनुष्य जन्मजात इन्हें जानता है। जो आज बड़े बड़े ठेकेदार रहे हैं, उन्होंने भी छोटे से शुरुआत की थी। पर उचित भेंट देते रहने के कारण उनका काम कहाँ से कहाँ पहुंच गया है। अच्छा तो वही है जो कि अधिकारियों को अच्छा लगे।

  सत्तो का कार्य अच्छा होने पर भी अच्छा नहीं रहा। उसके बिलों का भुगतान लंबित रहा। वैसे उसे विभिन्न तरीकों से सच्चाई समझायी गयी पर ईमानदारी की टशन में सत्तो ने सुना अनसुना कर दिया।

  आज समय बदल गया। आनन फानन में विधायक जी श्री सत्यदेव जी के पुराने बिल तलाशे गये। जल्द विलंब शुल्क के साथ चैक तैयार किया गया। ठाकुर साहब के बड़े सुपुत्र संतोष जो कि विभाग के बड़े अधिकारी थे, खुद ही चैक लेकर विधायक जी से मिलने चल दिये।

   दूसरों के मान सम्मान की परवाह न करने बाले अक्सर मौके की नजाकत देखते हुए खुद के मान सम्मान को भी ताक में रखने से पीछे नहीं रहते हैं। संतोष को इस बात से ज्यादा तकलीफ नहीं हुई कि विधायक जी ने उसे घंटो इंतजार कराया। इंतजार करने के समय भी उसे बैठने के लिये कोई कुर्सी भी नहीं दी। हालांकि संतोष वापस जा सकता था। फिर भी वापस जाना उसके वश में नहीं था। वैसे भी विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने संतोष को स्पष्ट बोलकर भेजा था कि विधायक जी को चैक देकर ही वापस आओंगे। आखिर विधायक जी के बिलों पर प्रतिकूल रिपोर्ट उसी ने तो लगायी थी। समय के साथ रंग बदल लेना समझदारी ही है। अब वे विधायक हैं। सुना यह भी जा रहा है कि शायद उन्हें किसी मंत्रालय को सोंपने की तैयारी भी है। ऐसे में यदि मंत्री जी की तरफ से कोई कार्यवाही हुई तो संतोष को ही पूरी तरह से दोषी माना जायेगा।

   सत्य तो यही है कि सत्यदेव जी के भुगतान के मामले में संतोष अकेला दोषी न था। बेईमानी की कमाई भी वह ईमानदारी से वरिष्ठ अधिकारियों को बांटा करता था। नगद नारायण के अभाव में किसी भी ठेकेदार के बिलों को रोके रखने का मौखिक निर्देश भी उन्ही वरिष्ठ अधिकारियों का था। पर सत्य है कि विभागीय कार्यवाही के समय हमेशा लिखित दस्तावेज देखे जाते हैं। जो कि हर तरीके से संतोष को ही दोषी सिद्ध कर रहे थे। यदि घंटों इंतजार के बाद भी विधायक जी की कृपा मिल जाये तो भी उसमें कोई समस्या नहीं है।

   आखिर विधायक जी ने संतोष को भीतर बुलाया। जाते ही संतोष ने विधायक जी के चरण स्पर्श किये। हालांकि एक बार संतोष के भीतर बैठे ठाकुर साहब की अंतरात्मा ने उसे एक अनुसूचित जाति के आदमी के चरण स्पर्श करने से रोका। पर अब किसी ठाकुर की बात सुनने का समय नहीं था। सफलता के साथ ही व्यक्ति की जाति भी बदल जाती है। विधायक जी तो परम पूज्य हैं। इनके दरवार में कितने ही पंडित और पुजारी भी हाजरी लगा रहे हैं।

    मौके को भुनाना मानव स्वभाव है। वैसे भी पुराने अपमान को भूलना इतना आसान नहीं होता है। भले ही सत्यदेव जी विधायक बन चुके थे फिर भी उन्हें वह क्षण याद था जबकि वह संतोष के सामने हाथ जोड़ रहे थे। उनसे अनुरोध कर रहे थे। आखिर इस काम में उन्होंने अपनी सारी जमा पूंजी लगा दी थी। पूरी गुणवत्ता से काम किया है। यदि उनका भुगतान नहीं हुआ तो उनके बच्चे सड़क पर आ जायेंगे। पर संतोष को उस समय सत्यदेव के आंसुओं की परवाह नहीं थी। फिर बिल का भुगतान रोका किसने है। चपरासी ने पिछली बार भी इसके कान में समझा दिया था। आज फिर आया है तो भी खाली हाथ। सुबह सुबह का समय खोटा कर दिया। गुस्से में तिलमिलाए संतोष ने सत्तो को अपने चैंबर से बाहर निकाल दिया।

  वैसे विधायक जी चाहते तो आज वह संतोष को फटकार कर भगा सकते थे। पर ऐसा करने में उन्हें आनंद नहीं आया। मन पर लगी पुरानी चोट ताजा हो उठी। उस पर मलहम लगाने का समय आ चुका था।

  " कौन हो भाई। क्या समस्या है। सुना है कि आप बहुत देर से हमारा इंतजार कर रहे थे। वैसे भी हम हैं समाज के सेवक। समाज की सेवा के लिये ही जनता ने हमें चुना है। ईश्वर का आशीर्वाद ही समझो कि अभी मुख्यमंत्री जी से फोन पर वार्ता चल रही थी। आखिर मंत्रिमंडल का गठन जो होना है। मैंने भी पीडब्ल्यूडी मंत्रालय की मांग की है। आखिर जिसके बारे में अच्छी तरह पता हो, वहीं तो अच्छा काम कर सकते हैं। उसी में सुधार ला सकते हैं। और पीडब्ल्यूडी की प्रणाली मुझसे बढकर कौन जानता है। "

  संतोष का मन एक बार फिर से भविष्य की चिंता में सिहर उठा। विधायक जी का एक सेवक उनके पैर दबा रहा था। संतोष भी जमीन पर बैठकर उनके पैर दबाने लगा। जिसका विधायक जी ने कोई प्रतिवाद न किया। विधायक जी से मिलने अनेकों लोग आते और जाते रहे। संतोष चुपचाप सर झुकाकर उनके पैर दबाता रहा। इस समय उसे अपने सम्मान से ज्यादा अपने भविष्य की चिंता थी जो कि विधायक जी की कृपा से ही संभव लग रही थी।

क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'