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कैद है परदों में , एक औरत की जिंदगी।
बन्द है रिवाजों में , एक औरत की जिंदगी।।
कैद है परदों में --------------------।।

मन में उठी उमंग को , दफना दिया उसूलों में
कटी हुई पतंग है , एक औरत की जिंदगी।।
कैद है परदों में-----------------।।

किया है सूरत को पेश , बनाकर एक नजराना।
बाबुल के घर बोझ है, एक औरत की जिंदगी।।
कैद है परदों में ---------------------।।

बढ़ने लगे इनके कदम, पुरुषों से आगे जब भी।
बना दी कांटों की सेज, एक औरत की जिंदगी।।
कैद है परदों में -----------------------।।

जलने लगी बनकर चिराग, नाम रोशन करने को।
बना दिया तब अर्धांगिनी, एक औरत की जिंदगी।।
कैद है परदों में--------------।।

कहने को आजाद है, कहते हैं इसको देवी भी ।
झुका हुआ चेहरा है क्यों, एक औरत की जिंदगी।।
कैद है परदों में -----------------------।।



रचनाकार एवं लेखक- 
गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद