उसने
अपनी झुकी हुई पलकों से कुछ कहा -
बैचेनी में डूबा सा दिल का लावा अचानक बहा-
और निकल कर एक प्यार का स्त्रोत 
दिल के धरा से फूट कर यूं बहने लगा-
चुपचाप मोहब्बत की अनकही दास्ताँ लिखने लगा-
बस अब तुम्हारे सिवा 
कहां आता था कोई भी नजर-
उड़ चला था दिल का पखेरू मोहब्बत के लगा कर पर-
तुम्हारी मुस्कान 
नजरों के दर से गुजर कर दिल के दरिया में गहराई तक डूब गयी थी-
गजब थी वह अदा
जब तुम्हारी वह लहराती लट 
करती हुई अठखेलियाँ, शैतानी के आलम में गुलाबी अधरों को आहिस्ता से चूम गयी थी-
आज भी तुम्हारी अदाओं की
वह वाजीगरी अंकित है दिल-ए-कैनवास पर-
मानों चांद की लुपाछिपी 
चल रही हो बादलों से छाये आकाश पर-
                       राजीव रावत
            भोपाल (म0प्र0)