मेरे गाँव के पुश्तैनी घर के 
सामने खड़ा ये बूढ़ा बरगद 
साक्षी है मेरी कई पीढ़ियों के सुख और दुःख का
मेरे घर का प्रहरी बन खड़ा ये बूढ़ा बरगद 
ना जाने मेरी कितनी पुश्तों का 
लेखा जोखा लिये खड़ा है
ये साक्षी है, मेरे गाँव के बुजुर्गों की
उन सभी बातों का 
जो इसकी छाँव मे बैठ कर की गई
इस बूढ़े बरगद की बाहों मे झूल कर
गाँव के कितने बच्चे आनन्द विभोर हुआ करते थे
ये बूढ़ा बरगद साक्षी है 
हर उस घटना का जो इस गांव मे घटित हुई
और साक्षी है उन शहनाईयों का 
जो इस गाँव मे बजती आयी है
ये बूढ़ा बरगद ना जाने 
कितनी तकलीफे को झेल कर 
आँधी,बारिश, तूफान मे पहाड़ की भांति
आज भी अडिग खड़ा है।
इसी की छाँव मे बैठ कर गाँव कर बुजुर्ग
अपने सुख दुख के पल बाँटा करतें थे
ये साक्षी है उन सभी फैंसलो का
जो पंचायतो ने इसी की गोदी मे
बैठ कर सुनाया करते थे।
कविता गुज्जर