मेरे मनोभावों की सरिता को प्रखर हो बहने दो ,
मौन रहूं कब तक ,अब तो कुछ कहने दो ,
ना बांधो मुझे तहज़ीब की खोखली जंजीरों में ,
ना समेटो मेरे भाग्य को हाथों की लकीरों में ,
खुला गगन , उड़ते परिंदो संग कुछ दूर तो उड़ने दो ,
बहती पवन , ठंडा झोखा बन कुछ दूर तो बहने दो,
काले घने बादल ,बरखा बन एक बार तो बरसने दो ,
सावन में झूले पड़े ,कोई गीत तो गुनगुनाने दो ,
फूलों संग खिल जाऊ , जरा बगिया को महकाने दो ,
घना जंगल हरियाली चहुं ओर ,मृग बन विचरण करने दो,
गहरा समन्दर मीन बन , लहरों संग तैरने दो ,
पूर्णिमा चन्द्र की चांदनी बन,आसमां में चमकने दो ,
प्रकाशित भानु रश्मि बन ,सृष्टि में उजियारा फैलाने दो ,
हाथ कलम ,दिल के जज़्बात कागज पर लिखने दो ,
रो - रो थकी - हारी , शुकुं की चन्द सांसे तो लेने दो ,
मौन रहूं कब तक, अब तो कुछ कहने दो ,
नेहा धामा " विजेता "
बागपत , उत्तर प्रदेश

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