नीरव सी शांति सागर किनारे हुई
शाम का सूरज अंतस पर फैला जैसे
प्रतीक्षा कर रहा भोर के सूरज का जैसे
अँधेरों से उजाले की ओर बढ़ता हुआ जैसे
रेज़ा रेज़ा बिखरे मन शंकाओं से घिरा हुआ
प्रतीक्षा थाम लेती विश्वास को खोने से जैसे
संघर्ष अनुरागी बनना जीवन की रीत हो जैसे
दिल के कोने में सुकूं के मौसम लहराए हो जैसे
सामने पंथ जीवन का,चुनौती देता हुआ हो जैसे
जीवन व्यर्थ ना गवाँओ, ये बताता हुआ हो जैसे
जीवन से आस लगाएं प्रतीक्षा भी बैठी हो जैसे
आघातों को भूल कर्म की बदरा बरसी हो जैसे
आरती झा(स्वरचित व मौलिक)
दिल्ली
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