मैं प्यारे हिंदुस्तान देश का रहने वाला हूँ,
जहाँ की मेरी प्यारी हिंदी मातृ भाषा है।
कोई शर्म नहीं मुझको अंग्रेजी ना आये,
भारत की तो यही सर्व प्रिय 1 भाषा है।
आप भी आइये इसका आनंद लीजिये,
इन मुहाबिरों को सुनिये ध्यान कीजिये।
हमारे बुजुर्गों के अनुभवों की ये है शान,
यह मेरी हिंदी भाषा की सबकी है जान।
गृहस्थी की हर चीज इसमें इतनी भरी है,
फल सब्जी आटा तो कहीं दाल कढ़ी है।
कहींपे मिठाइयाँ तो कहीं भरा है मशाला,
यह सभी मुहाविरे हैं हिंदी ज्ञान की माला।
एक एक कर के आयें इसका मजा उठायें,
खुदभी सीखें व दूसरों कोभी इसे सिखायें।
जैसे हैं "आम के आम व गुठलियों के दाम",
तो कहीं पर भरे पड़े हुये हैं"आँधी के आम"।
लगते फल कभी मीठे कभी "अंगूर खट्टे हैं",
इसके आगे तो होजाते "सबके दाँत खट्टे हैं"।
कुछको जीवनमें पड़े "लोहे का चना चबाना",
कहींकहीं तो"अपनी खिचड़ी अलग पकाना"।
कहते हैंवो "अढ़ाई दिन की हुकूमत चलाता है,"
हरदम ही "गेहूँ के साथ घुन भी पिस जाता है"।
कभी कहीं कहींपे लगे "दाल में कुछ काला है"
किसी के घर कोई "अँधेरे घर का उजाला है"।
रचयिता :
डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव
वरिष्ठ प्रवक्ता-पी बी कालेज,प्रतापगढ़ सिटी,उ.प्र.

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