मुरली मधुर तुम बहुत बजाते
मुरली की धुन पर रोज नचाते
रोज रोज नए नए प्रपंच रचाते
मोहे भरमाते,काहे मोहे रिझाते
तुम हो कान्हा
मै बावरी सुध-बुध बिसराकर
तुम में ही रम जाती हूं
शाम ढले जब घर जाती
उल्हाने माईं के खाती हूं
फिर रैन ढले तेरी मोहक
मुरली की धुन सुनते ही
लोक लाज बिसराकर फिर
नंगे कदमों दौड़ी आती हूं
देख कन्हैया मत उलझानवै
मुरली तेरी बहुत खिजानवै
जब जब मैं बावरी
तोसों मिलने आती हूं
तेरी मनमोहक मुरली
पर मै बलिहारी जाती हूं।।
शीतल शैलेन्द्र "देवयानी"
इन्दौर

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