श्री सत्यदेव जी विधायक भी बने और मंत्री भी। उन्हें उनके मनमुताबिक मंत्रालय भी मिल गया। पर अब संतोष को कोई समस्या नहीं थी। अपनी व्यवहार बुद्धि से संतोष ने विनम्रता कहें अथवा चापलूसी कहें, से वह पा लिया जो कि असंभव लगता था। मंत्री जी को खुश करने के लिये संतोष ने अपना स्वाभिमान ही नहीं बेचा अपितु उसने और भी बड़ी कीमत चुकायी। हालांकि अब मंत्री जी की कृपा से उसे उस बृहत कीमत का प्रतिफल भी मिलने बाला था।
संतोष से मंत्री जी ने भी बहुत कुछ सीखा। मतलब सिद्ध करने के लिये गधे को बाप बनाने की विद्या उन्होंने संतोष से ही सीखी। मानव मन जल की उस धारा के समान है जो कि नीचे ही गिरता है। ऊपर उठाने के लिये विशेष यत्न करने होते हैं। कुसंगति अच्छे अच्छों के विचारों को बदल देती हैं। कभी अपनी ईमानदारी की ठनक के लिये जाना जाता सत्तो, मंत्री सत्यदेव बनते ही अपने पुराने पलों को मूर्खता मानने लगा। आज पुरानी मूर्खता की क्षति को लाखों गुना गति से सही कर रहे थे। और इस काम में उनका साथी था संतोष।
संतोष को एक के बाद अनेक आउट ओफ टर्म प्रमोशन मिलते गये। वह अनेकों सीनियरों से सीनियर बन गया। बड़ी बड़ी परियोजना उसके अधीन हो गयीं। अब उसे मिलने बाली रिश्वत की राशि अब पहले से कई गुना हो गयी। हालांकि संतोष के आउट ओफ टर्म प्रमोशन से उसके सीनियर नाराज थे। भले ही मंत्री जी के निर्णय के खिलाफ वे कुछ नहीं कर सकते थे फिर भी कानून का सहारा लेने से कोई किसी को रोक नहीं सकता है। आज भी विश्वास किया जाता है कि कानून न्याय की रक्षा के लिये है। न्यायालयों में न्याय अवश्य मिलता है। भले ही समय लग जाये।
इन न्यायिक अवधारणाओं से दूर संतोष तो इस समय केवल और केवल रिश्वत से घर भरने में लगा हुआ था। भगवान के दरवार में संतोष का चढावा भी कई गुना बढ चुका था।
मंत्री जी जैसे विरोधी को अपने पक्ष में कर लेने से संतोष का आत्मविश्वास सातवें आसमान पर था। आगामी जीवन में भी वह अपनी चापलूसी जैसे अस्त्र का प्रयोग कर अपना प्रयोजन हल कर लेने की खुद की क्षमता पर उसे पूर्ण विश्वास था। वैसे भी उसे लगने लगा था कि न्याय की देवी भी रिश्वत की उपासिका हैं। न्याय के आसन पर बैठे हुए के निर्णय को खुद के पक्ष में करा लेने की क्षमता पर उसे पूरा भरोसा था। संतोष का भरोसा सही भी साबित हुआ जबकि कैट न्यायालय ने संतोष की पदोन्नति के खिलाफ उसके सीनियरों की याचिका को खारिज कर दी। वैसे भी विशेष परिस्थितियों में विशेष पदोन्नति का प्रावधान है। पदोन्नति के अवसर पर अधिकारी की कार्य क्षमता अवश्य देखनी चाहिये।
ऊंट कभी भी एक करवट नहीं बैठता है। संतोष के अनुमान के विपरीत उच्च न्यायालय में उसकी पदोन्नति की सुनवाई में पासा बदल गया। अब या तो यह न्यायाधीश की न्यायप्रियता थी कि उसने संतोष की भेंट भी लेने से मना कर दिया। अथवा संभव यह भी है कि कैट में अपनी असफलता को देख उसके सीनियर भी उच्च न्यायालय में अपनी भूल सुधार चुके हों। फिर पदोन्नति की मांग वे केवल अपने सम्मान के लिये नहीं कर रहे थे। वे भी अपनी दसों उंगली घी के कनस्तर में डालना चाहते थे। लक्ष्मी देवी की कृपा पाने के लिये उन्होंने भी लक्ष्मी देवी की भेंट न्यायाधीश को चढाई हो। जो भी रहा पर संतोष के सपनों पर पानी फिर गया।
अब संतोष फिर से पुराने पद पर कार्यरत था। साथ ही साथ अब उसे ऐसे कार्यभार दिये गये जबकि उसके हाथ में अब रिश्वत का एक रूपया भी बड़ी कठिनाई से आता था। विभिन्न परियोजनाओं का संचालन अब उसके हाथ में न रहा। रिश्वत की आय से ऐशोआराम करने बाले संतोष और उसके परिवार के लिये यह बड़ी विपदा की घड़ी थी। अब तो मंदिर में पुजारी भी उससे नजरें चुराने लगे।
मंत्री जी को दूसरे अधिकारी का साथ मिल गया तो उन्हें संतोष की क्या जरूरत। सीढी की तरह दोनों एक दूसरे को प्रयोग कर रहे थे।
पर लगता है कि अभी तो संतोष और सावित्री के दुर्दिनों का आरंभ था। शायद उन्हें अनुमान भी न था कि मंत्री जी की ज्यादा चापलूसी कर उन्होंने जिस तरह अपने वरिष्ठ अधिकारियों को खुद के खिलाफ किया है, उसका क्या परिणाम हो सकता है।
सच्चाई तो यही है कि बेईमानी की आय से संचित ऐशोआराम एक न एक दिन जरूर मिट जाते हैं। बेईमानी की आय से तैयार महल एक न एक दिन जरूर गिर जाते हैं। बेईमानी की कमाई से पोषित परिवार सिद्धांतों की अवधारणा से शून्य हो जाता है। ईमानदारी से बहुत रईस भले न बनो पर दाल रोटी तो नसीब होती रहती है। बेईमानी से ऐश्वर्य के शिखर तक पहुंचे संतोष को अभी वह दिन देखना भी शेष था जबकि उसे दाल रोटी भी नसीब न हो। बहाने भले ही वरिष्ठ अधिकारियों की नाराजगी के बन जायें पर यथार्थ तो यही है कि मनुष्य के खुद के कर्म ही उसकी बद से बदतर स्थिति के लिये जिम्मेदार होते हैं।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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