मन के भाव समेट कर, दिया अनोखा रूप।
धीरे-धीरे हो गया, वह तेरे अनुरूप।।
पुष्पों के मानिंद हैं , अधर तुम्हारे लाल।
कानों में करते लगे , कुंडल मुझे कमाल।।
भौंहें बनीं कटार सी , नयना बने विशाल।
ग्रीवा सांचे में ढली , दमक रहा है भाल।।
मुख मंडल ऐंसा लगे , चांद कोई बेदाग।
कोयल जैसे वयन से , बरस रहा अनुराग।।
गर्दन की शोभा बना , प्रिय सोने का हार।
बाजूबंदों को मिला , बांहों का अति प्यार।।
नागिन सी चोटी रही , कम्मर तक बल खाय।
शोभा कटि की बन रही , करधौनी लहराय।।
सांचे में ढाला बदन , हिरणी जैसी चाल।
कुदरत की अनुपम कृती, क्या दूं तुम्हें मिशाल।।
यौवन तन पर ला रहे ,अनुपम और निखार।
स्वर्णाभूषण से सजी , अतुलनीय गुलनार।।
माहुर पैरों में लगा , कजरा अखिंयन डार।
मोहन का मन मोहती , बरसाने की नार।।
रावत तेरे रूप का , कैसे करे बयान।
लगती मुझको आज वह , ज्यो सोने की खान।।
रचनाकार ✍️
भरत सिंह रावत
भोपाल मध्यप्रदेश

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