उद्योग पति की भेंटे चढ गई, ईंधन की कूआ सारी
उद्योग वाहन और बिजली उपलब्ध हुई भरपेट
परिणामस्वरूप मेहमान हुआ कुछ दशकों का घासलेट
हर गली हर घर, मोटर बन गया प्रतिष्ठा का प्रतीक
पर्यावरण की उड गई धज्जियाँ, परेशान हुआ गरीब
तेल खरीदी ने अर्थ प्रबंधन को ऐसी दुल्लती मारी
मृगतृष्णा बनी मूल सुविधाएं, कब आती इनकी बारी
चलो करें कुछ ऐसा प्रबंध, ईधंन का ऐसा हो उपयोग
तरक्की करें उज्जवला योजना, उच्च वर्ग को छोड़
एक खास उपाय मैं बतलाऊँ, जो है समय की माँग
सार्वजनिक वाहन दक्ष हो, इसपर हो सरकार का ध्यान
उच्च स्वर में बच्चे, युवा और बूढ़े लगाए यह नारा
सत्त मानव का विकास हो मूलतंत्र हमारा
रंजना झा

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