गाँव की एक सर्द रात मे
घुमड़ घुमड़ कर आये रे बदली
पिया मिलन की आस लगाये
नीर आंखो से बहाये रे पगली

सर्द रात के प्रथम पहर मे
याद पिया की आये रे
बुझे दीपक,घोर अन्धेरे मे
रात भर दिया जलाये रे पगली

सर्द रात के दूजे पहर मे
चुपचाप बरखा बरस रही है
दूर तलक सन्नाटे है
आहट से ड़र जाए रे पगली

सर्द रात के तीजे पहर मे
हवा शोर मचाये रे
ठीठुरे तन को समेट कर
तखते फिर लगाये रे पगली

चोथा पहर अब आने को है
थक चुकी है बरखा भी
तृप्त हुई न आँखे अब भी
करे प्रतीक्षा हाय रे पगली
कविता गुज्जर