थोडी सी खुशी थी तुमने कहा था तुम आओगे!
तुम तो चले गए, मगर मैं ठहरी रही उसी मोड़ पर,
कि तुम्हारे वचन आज भी गूंजते हैं ज़हन में!
मैं आज भी प्रतीक्षारत हूँ कि
कभी तुम्हारे शब्द लौट कर तुम तक आएंगे!
तब शायद तुम्हे आभास हो मेरे होने का-
या शायद! न होने का!
उस दिन मेरी प्रतीक्षा का प्रतिफल मिलेगा,
उस दिन तुम ज़रूर आओगे!
वहीं, जिस मोड़ पर छोड़कर आगे बढ गए थे तुम,
लौटकर मेरी तलाश में तुम वहाँ ज़रूर आओगे!
मैं, मेरा मन, मेरी धड़कन ठहरी है
आज भी उसी अमलतास के तले,
उन बिखरे से पीले फूलों में आभास मेरा ही पाओगे!
समेट लेना उन्हें अपनी हथेलियों में कि
कुछ आराम मिल जाएगा मेरी रूह को!
तुम्हारे कदमों की पदचाप से
फिर गुंजायमान होगा मेरा संसार,
तेरी सांसों से महक जाएगा मेरा भी मन!
भंग न होने देना, पूर्ण करना, कि
मेरी प्रतीक्षा मेरा प्रेम है; मै तपस्यारत हूँ अभी!
एक दिन होगी पूरी-मेरे देव,
कि प्रतिफल देना तुम्हारा धर्म है!
बस, यही एक एहसास हारने नहीं देता मुझे-
आस बाकी है, कि भरोसा है कि तुम आओगे!..
शालिनी अग्रवाल

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