ऐसे बेदर्दी से लागे मोरे नैना।
 दिन नहीं चैन रात नहीं  निंदिया।। 
सखियाँ मोरी रोजई
पूँछें ।
काहे रिसानी  मोरी गुईयाँ।।
कै तोहे  सास ननद  दुख दीन्हे ।
कै घर छाँड़ि गए साँवरिया।। 
सास ननदिया ताना मारे। 
बैरन हो गई मोरी जिठनिया।। 
छल्ला मुँदरी मन नहिंं भावे।
काजर सूनी मोरी अँखियाँ।। 
फिर फिर जाऊँ पनघट बगिया। 
बाट तकौ  मैं बैठी दुअरिया।।
स्वरचित मौलिक अप्रकाशित सर्वाधिकार सुरक्षित डॉ आशा श्रीवास्तव जबलपुर