मुख्य भूमिका  -

खंडोंजी नैवेशी पटेल - सावित्री बाई फुले के पिता

लक्ष्मी बाई  -  सावित्री बाई फुले की माता

सावित्री बाई फुले - स्वयं

ज्योतिराव गोविंद राव फुले - सावित्री बाई फुले के पति एवम् महान समाज सुधारक

फातिमा शेख़ , उस्मान शेख़ - सावित्री बाई फुले और ज्योतिबा फुले  के शुभचिंतक, मित्र

कुछ अन्य भूमिकाएं।

प्रथम दृश्य

(नन्हीं सी बच्ची सावित्री अपने घर के आंगन में मिट्टी से आड़ी तिरछी रेखाएं खींचती हुई अपनी मां लक्ष्मी से कहती है) 
                                                                
सावित्री - आई , सारे लड़के पाठशाला जाते हैं । अपना बस्ता और पट्टी लेकर । तू मुझे क्यों नहीं जाने देती। 

लक्ष्मी विवशता से अपने पति खंडोजी की तरफ देखती है

(खंडों जी अपनी लाडली बेटी को  अपने पास बुलाकर गोद में बिठा लेते हैं और उससे प्यार से पुचकारते हुए कहते हैं )
  - तू तो अपनी मीठी मीठी बातों से पूरे घर को पढ़ाती है । तुझे क्या जरूरत है पाठशाला जाने की ?

सावित्री - पर बाबा ... मुझे अच्छा लगता है । देखो ना सब लड़के पाठशाला जाते हैं। और घर में भी पढ़ते हैं।

खंडों जी -( एक ठंडी सांस  हुए) , इसलिए कि वो लड़के हैं, और तुम लड़की । ये समाज लड़कियों को पढ़ने की अनुमति नहीं देता। 

सावित्री - क्यों बाबा?  लड़कियां क्यों नहीं पढ़ सकती? क्यों उनसे केवल घर का काम कराया जाता है।

लक्ष्मी - ( मुस्कुराते हुए) इधर आ , मैं बताती हूं। क्योंकि उन्हें अपनी ससुराल जाकर घर का काम ही तो करना होता है। अगर काम काज नहीं सीखेंगी तो वहां जाकर अपने आई बाबा की नाक कटाएंगी क्या?

सावित्री - आई .... मैं तो पढूंगी और घर का काम भी करूंगी।

लक्ष्मी - पर तुझे पढ़ाएगा कौन?  कोई मास्टरनी भी तो नहीं है। पाठशाला से तुझे सब भगा देंगे। कभी किसी लड़की ने पाठशाला का मुंह नहीं देखा।

सावित्री - आई .... बाबा...   आप देखना , एक दिन  मैं खुद भी पढूंगी  और सबको भी  पढ़ाऊंगी ।  नन्हीं सी सावित्री का चेहरा आत्मविश्वास से चमक उठा।

खंडों जी - ( सावित्री के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए)  गणपति बप्पा तेरी यह इच्छा जरूर पूरी करेंगे बेटी।

द्वितीय दृश्य
9 वर्ष की अल्पायु में सावित्री  विवाह वेदी पर बैठी है । पंडित जी मंत्रोच्चार कर रहे हैं । 12 वर्ष के बालक ज्योति राव  गोविंद राव फुले बहुत ही गंभीर स्वभाव के हैं। खिलौने खेलने की उम्र में विवाह रूपी खेल हो रहा है। बालक ज्योतिराव विवाह के वचनों को बहुत ध्यान से सुनता है और उनका पालन करने का संकल्प लेता है।

सावित्री अपनी ससुराल पहुंच कर सारी जिम्मेदारी संभाल लेती है। उसका नाम सावित्री से सावित्री बाई हो जाता है एक दिन ज्योतिराव सावित्री से कहते हैं।

ज्योतिराव - सावित्री... हमने देखा है कि तुम रसोई बनाते समय जमीन पर कुछ लिखने का प्रयास करती हो। क्या तुम पढ़ना चाहती हो ?

सावित्री बाई - जी हां.…मैं बचपन से ही पढ़ना चाहती थी। लेकिन कैसे पढ़ती? लड़कियों को पढ़ने की अनुमति नहीं थी।

ज्योतिराव - तुम दुखी मत हो। हम तुम्हें पढ़ाएंगे। और तुम्हें एक दिन स्त्री शिक्षा की नींव बनाएंगे।

सावित्री की आंखों में खुशी से आंसू आ जाते हैं। उसका बहुत बड़ा सपना पूरा होने जा रहा था। उसे विश्वास हो गया था कि अब उसके वर्ग की लड़कियां भी पढ़ सकेंगी।

(सावित्री बाई अपने पति के सहयोग से शिक्षा प्राप्त करती है, उसके मार्ग में दकियानूसी सोच के लोग बहुत सी बाधाएं खड़ी करते हैं लेकिन वो हार नहीं मानती।और अंत में भारत की प्रथम शिक्षिका बन जाती है।

तृतीय दृश्य

(1जनवरी 1848 का शुभ दिन,आज सावित्री बाई ने लड़कियों के लिए पहली पाठशाला खोली है,अब लड़कियां भी पाठशाला जा सकेंगी , इस विचार से ही लड़कियों में अपार हर्ष है)

सावित्री बाई पाठशाला जा रही है ज्योतिबा फुले भी उनके साथ हैं। तभी प्रतिदिन की तरह  कुछ लोग  उन पर गोबर, पत्थर, गंदगी आदि फेंकने लगे ।अक्सर ऐसा होता था जब सावित्री बाई पाठशाला के लिए निकलती तो लोग उन पर कूड़ा कचरा ,गोबर और पत्थर आदि फेंकते ।सावित्री अपने थैले में एक साड़ी लेकर जाने लगी ।j वो पाठशाला पहुंच कर अपनी गंदी साड़ी बदल लिया करतीं। आज भी उन पर पत्थर और गोबर बरसने लगे और लोग  चिल्लाने लगे।

"ये धर्म विरुद्ध कार्य है , हम ऐसा अनाचार नहीं होने देंगें।आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ, लड़कियों को शिक्षा देना समाज को दूषित करना है।, चलो हम सब इसके पिता गोविन्द राव से इसकी शिकायत करते हैं।"

चलो ...समवेत स्वर में सब बोले।

वो सब  ज्योतिराव के पिता और सावित्री बाई के ससुर गोविन्द राव से इनके इस कार्य की आलोचना करते हैं और समाज से निष्कासित करने की धमकी देते हैं।

गोविंद राव...अगर तुम्हे इस गांव में रहना है तो अपने बेटे और बहू को पाठशाला जाने से रोकना होगा वरना तुमको और तुम्हारे परिवार को गांव से बाहर निकाल दिया जाएगा।

गोविन्द राव - ( हाथ जोड़ते हुए) नहीं महराज ... हमें गांव से मत निकालिए ..हम अपनें बेटे बहू को समझा देगें।

सभी -  यही तुम्हारे लिए ठीक रहेगा।और सब चले जाते हैं।

गोविन्द राव ज्योतिराव और सावित्री बाई को समझाते हैं लेकिन ज्योतिराव उनकी बात नहीं मानते तब गोविन्द राव क्रोधित होकर उन्हें और सावित्री बाई को घर से निकाल देते हैं।

अंतिम दृश्य

(वो लोग अपने शुभचिंतक और मित्र फातिमा शेख़ और उस्मान शेख़ के घर चले जाते हैं और वहीं अपनी पाठशाला को पुनः आरंभ करते हैं )

फातिमा शेख़ - बहन...आज के बाद वे घर तुम्हारा है।तुम इस यहां अपनी पाठशाला शुरू कर सकती हो। अल्लाह सब खैर करेगा।

उस्मान शेख़ - हां ज्योति राव भाई .... फातिमा सही कह रही है । अल्लाह का नाम लेकर हम सब पाठशाला शुरू करते हैं। उसने चाहा तो औरतों की तालीम का आपका  ख्वाब जरूर पूरा होगा। आपके हर क़दम पर हम दोनों आपके साथ हैं।

(तीनों मिलकर  आस पड़ोस की महिलाओं, लड़कियों की एक सभा बुलाते हैं।)

सावित्री बाई - (सभा में उपस्थित महिलाओं और लड़कियों को संबोधित करते हुए) ...… बहनों... बेटियों... हम सबको शिक्षा पाने का पूरा अधिकार है। शिक्षा हमारा हथियार है। जिससे हम अन्याय के खिलाफ लड़ सकते हैं। इसलिए पढ़ने के लिए आगे बढ़ो। कुछ करने के लिए आगे बढ़ो। रूढ़ियों को तोड़ना होगा। उन नियमों को पीछे छोड़ना होगा जो हमें पढ़ने से रोकते हैं। कमर कस लो सब लोग। समाज की बेड़ियों को तोड़ने के लिए....…क्या तुम सब मेरे साथ हो?

समवेत स्वर में - हां हम सब आपके साथ हैं। हम पढ़ेंगे .. आगे बढ़ेंगे। अब हमें कोई नहीं रोक सकता।

(सावित्री बाई के चेहरे पर संतुष्टि भरी मुस्कान आ जाती है। अब उनके सामने दुनिया की आधी आबादी का उज्ज्वल भविष्य दिखाई दे रहा था)

समाप्त

लेखिका 
संगीता शर्मा
(सहायक अध्यापक)
प्राथमिक विद्यालय