स्वेत वर्ण में लिपटी खामोश सी जिंदगी
अबला, नारी, स्त्री सदा से ही हाशिये पर क्यूँ है ?

अस्तित्व पर इसके होते हैं रोज ही हमले
शक्ति का प्रतीक जो वो इतनी लाचार पर क्यूँ है ?

कोई वस्तु, वो नहीं कोई भोज की थाली
काम से भीगी नज़र नियत इतनी बीमार पर क्यूँ है ?

ख़ुद की हदों को नित् लांगते समाज के सेवक
परदों इसको रखने की कोशिश हर बार पर क्यूँ है ?

खोखले रिवाज़ों ने छीन ली कोयल सी सदा
इस दहलीज की चौखट एक क़ैदखाने सी पर क्यूँ है ?

तुम सोच बदलो, फिर बदलाव हो संसार में
जगत-जननी हृदय में इतनी कुंठा निराधार पर क्यूँ है ?

रचनाकार - अवनेश कुमार गोस्वामी