कभी कभी वक्त यूँ निकल जाता है-
हम पकड़ नहीं पाते हैं- 
गम में भी मुस्कुराना आता किसी को,
कहीं खुशी में भी आंसू बहते हैं!
दुनिया के अजब नज़ारे हैं!
अक्सर आसपास ही होती हैं मंज़िलें, 
कभी नज़र नहीं आती, 
तो कभी नज़रअंदाज कर जाते हैं!, 

कभी रेत की तरह फिसल जाता है वक्त हाथों से
बंद मुट्ठियों में भी थाम नहीं पाते हैं! 
हर पल में अलग उमंग है यहाँ, 
हर जीवन का जुदा रंग है यहाँ-
कभी खो जाते हैं सुहाने मंज़र तम के सायों में
कभी स्याह आसमानों में भी कई धनक खिल जाते हैं! 


कभी यूँ होता है- मिल जाते हैं हमसफर राहों में,
कभी तन्हा ही राहों में भटकते हैं! 
कौनसी राह चुनेगा कोई,कौन हमसफर पाएगा, 
मिल जाता हैं अनचाहे, बिन मांगे भी किसी को
जो हर दुआ में हम अपना बनाना चाहते हैं!
किसको कितना मिलना है, किसने कितना खोना है,
किस्मत के लिखे बही-खाते हैं !! 

भीगी आंखे, रोते चेहरे, 
लेने-देने, रिश्ते-नाते, 
रंगमंच सी दुनिया में रचने वाले ने जो रचे
हम खेल-तमाशे सारे हैं!
कितना भी चाहो, कितना ही सोचो, 
उसकी रज़ा हम कब समझ पाते हैं! 
हर पल पर है अधिकार उसका- 
हर वक्त, उसके इशारों पर नाचता है वक्त,
कितना भी चाहें हम, 
यह डोर हाथ आती नहीं,
वक्त को कब अपने बस में कर पाते हैं! 

कभी जो दौड़ा करते थे वक्त से आगे, 
वक्त आने पर ढलने लगते हैं 
वक्त तेज़ी से आगे निकल जाता है- 
और वो बस उसे देखते रह जाते हैं!

बहुत कुछ लिखा है किस्मत में किसी की, 
किसी की किस्मत में कुछ भी नहीं, 
कौन कितनी बाज़ी जीतेगा, 
जानता है बस वो, जिसने पांसे डाले हैं!
किसने कितना हंसना-रोना, 
भाग्य के लेख लिखे हैं सारे, 
किसने कितना पाना-खोना, 
किस्मत के खेल के नियम कुछ निराले हैं
स्वरचित- शालिनी अग्रवाल 
जलंधर