रस्म तो होगी निभानी, चाहे काबिल हम नहीं।
गर निभाई नहीं रस्म तो, कुछ भी काबिल हम नहीं।।
रस्म तो होगी निभानी-------------।।


जीना है गर जिंदगी को, ऑंसू भी पीने होंगे।
रखना है उनको तो खुश ,चाहे खुश हम नहीं।।
रस्म तो होगी निभानी-------------।।


हुई है हुकूमत हमेशा, मुफ़लिस पर दौलत की।
बहुत ही छोटे हैं उनसे, मना कर सकते हम नहीं।।
रस्म तो होगी निभानी--------------।।


उनको तो क्या होगी हानि, होंगे हम ही कर्ज में।
कुछ भी नहीं इज्ज़त हमारी, अजनबी भी हम नहीं।।
रस्म तो होगी निभानी------------।।


हो गए बर्बाद घर बहुत, रस्मों के इस समाज में।
लेगा नहीं कोई खबर कल, चाहे महफूज हम नहीं।।
रस्म तो होगी निभानी-------------।।



साहित्यकार एवं शिक्षक-
गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद
तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)