है झूठ से बड़ा कोई पाप नहीं, 
फिर भी सत्य को अपनाते नहीं।

झूठ चैन की नींद देता नहीं, 
सत्य की राह पर हम चलते नहीं। 

झूठ पीतल सा चमकता कुछ देर है, 
सत्य का सूर्य कभी अस्त होता नहीं।

सच की लकीरें कितनी भी मुश्किल, 
जीवन डगर पर मित्र सा देती साथ हैं।

झूठ ऐसा,रक्तबीज सा बढ़ता जाता है, 
सच ऐसा जो देता कभी भटकाव नहीं। 

झूठ होती कुछ दिनों की ही रवायत है, 
सच की करे रहनुमाई,खुदा की इनायत है। 

झूठ बनाती लफ्जों की हेराफेरी ही है, 
सच अटल अमर होती इसकी बंदगी है। 

निश्छल ये वाणी है साँच को आँच नहीं, 
झूठ चले उल्टा होते जिसके कभी पाँव नहीं। 
आरती झा(स्वरचित व मौलिक) 
दिल्ली
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