रात के जिस अंधेरे में दिल हो उठी थी बैचैन मेरी
डरावानी सी मन में आग और धुएं के उठ जाने से
जिस हवाओं से डर रही थी धड़कने मेरी
उनके और बढ़ते ही जाते रौद्र रुप दिखाने से
जैसे ही मैं सब आग और धुएं को भुलकर नींद में गया
क्योंकि मैं डर रहा था इस आग में जलकर रिश्ते टूट जाने से
कुछ अजीब सी चमक उठी मन में फिर नई कुछ हो जाने से
क्योंकि अब खिड़कियां भी गुनगुनाए जा रही थी किसी के आने से
मेरे इस जीवन में फिर से लौट कर आई खुशियां सवेरा आने से
मैंने देखा जब उठ जाकर खिड़कियों की तरफ तो
कुछ मुझे मनभावन सी आवाजे सुनाई दे रही थी
मेरा भी मन विचलित हुआ उस मधुर ध्वनि सुन जाने से
पता चला सुबह से गुज रही है बागवान चिड़ियों के चहचहाने से
इस दृश्य को देखने से ही मेरे गम की सारी तन्हाईयां दूर थी
क्योंकि जिन्दगी हमें फिर पुकार रही थी नए जीवन में बढ़ जाने से
दिल भी प्रसन्न होकर गा रहा था नई खुशियो के आ जाने से
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कुसुम
कुसुम

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