कोरोना से ज्यादा इंसानों से डरते हैं हम...
भुख में देख लोगों को हर पल  हर रोज मरते हैं हम...
वक़्त की इस कयामत को तो देखो ...
हवा से बात करने वाले घरों में क़ैद हो गए ।


बिछड़े हो पक्षी जैसे, अपनों से मिलने को अपने लिए बैचेन हो गए है ।
अब...
भूल गए हैं वो दिन,जब हमें काट कर खाया करते थे...
भूल गए जिसे हर रोज द्वार मार कर भगाया करते थे...
अरे, जो रोज़ खेलते थे प्रकति के बनाये परिंदो से।
अब उसका खिलौना बन के रह गए ,परिंदो को भी भला कोन बचाऐ प्रकृति के ही इन दरिन्दो से।


रोज हमें क़ैद किया करते थे,खुद के बनाये पिजरो में
आज खुद के पिंजरों में ही क़ैद हो गये ।
अरे मर मर कर पिजरो का भार हमसे ना सहा जाता था ।
हो कितनी भी घुटन फिर भी न कहा जाता था।मीलो से चल के आते थें अपनो की सुधी पाने को।
तुमने तो तरसा ही दिया हमको एक एक  दाने को। 


स्वतंत्र आसमां दीया था हमे संदेसा पहुचाने को।घर मे भी अब बाध दीया अपना मन बहलाने को।हमारे भूख से भोक्ने को अपनी सुरक्षा समझते हो ।
अरे ममता करना तो तुम्हारी आदत नहीं। 
तुम करते मोल भाव कहते खुद को अभिमानी हो। 
गौ माता को भूल गए तुम तो सठ नादानी हो। याद रखना दूध का कर्ज सबसे भारी सा होता है।इस ऋण से जो मुक्त हुआ वहीं असल प्राणी साथ होता हैं ।


उन्हीं पशुओं का क्षोभ......

प्रकति ने पर्याप्त दिया था खाने को ,।
अब भटक रहे है वो दाने को।
सारे बन्धन तो तुम तोड़ गए, थें 
अपने को को घर मे छोड़ गये थे ।


मां की ममता , पिता का दुलार,
सबको तो दुत कार दिया।.
अब भूखे दर-दर भटक रहें।
इन रजनीचर जैसी रातों में,
भला आश्रय कहाँ  मिले ,मुर्दो की परिपाटी मे।



अरे, अपने पेट की तृप्ति को, असुरों सा संहार किया।
मर्यादा की हर सीमा तोड़।
 जीवों पर ही  वार किया।
तनिक भी दया  तुमको..न उन पर आती थी।
युगों युगों से जैसे असुरों की ही थाती थी ।


आह!तो उनकी लगनी ही थी ..
जिन को तुमने काट खाए ।
मरना तो तुमको भी था।
जिसके तुमने वंश मिटाये...
मर्यादा का बंधन तोड़, 
मानवता का संहार किया..
मानव जैसी काया लेकर..
पशुओं से पशुओं सा व्यवहार किया।




ज्ञानी होकर भी अज्ञानता का प्रसार  किया।
जीते जी क़ैद किया और मरने पर व्यापार किया।
ईश्वर ने इंसान बनाया ..अपने साथ ही जीने को।
पर्याप्त मात्रा में रस दिया तुमको हर दम पीने को।
कम्बख्तों, तुम्हारी प्यास तो हमसे बुझती हैं.।
हमें पिंजरो में क़ैद करके तुम्हें तो मस्ती सूझती हैं।


अब खुद के पिंजरे में ही क़ैद हो गए।
खुद को बचाने में मुस्तेद हो गए...
हर वक्त अकेल घुटते हो । 
अपना जीवन बचा रहे हो..।
मानव को ही लुटते हो ।
भूख प्यास की तड़पन को भूखा ही समझता हैं।
अरे, अपनों की तो भूख सभी को भारी लगती है ।
जैसी भी हो..जीवन सभी को प्यारी लगती हैं।। 

  

                          


           सर्वेन्द्र मिश्र ✍🏻  ( विरक्त )