जब अंधेरी रातों में मुझे तेरी यूं याद आती है

मानों जैसे पूरी दुनिया ही ठहर सी जाती है 

बस मन मेरा  हमेशा यही पूछता फिरता है

क्या वह भी तूझे इस तरह हर पल याद करती होगी



क्या जब वह अपने चेहरे पर से बालों को हटाती होगी

तो क्या फिर मेरी उसे हर हरकतें याद आती होगी

शायद वह भी एक पल के लिए पूरानी बातें भूल जाती होगी

मेरे साथ बिताए हर लम्हे उसे जरूर सताती होगी



क्या मेरी तरह ही उसकी भी आंखें भर आती होगी

हां वह चाहकर भी नहीं लौट पा रही होगी मेरे पास

क्योंकि उसे वह मेरी कही हर बात फिर से चुभ जाती होगी

इसलिए वह अपनी प्रतिज्ञा को ही निभाती होगी



जरूर वह भी रातों को चांदनी में खो जाती होगी

फिर वही मुझसे बातें करतीं और अपनी सुनाती होंगी

कुछ मेरी  शिकायतें तो भी जरूर ही  करतीं होंगी 

उसकी बातों को न सुनने पर वह थोड़ी रुठ जाती होंगी



क्या मेरी पसंद की झुमके को पहनकर मुझे दिखाती होगी

शायद मुझसे ही पूछकर वह अधराग भी लगाती होंगी

हां सजने के बाद मेरे देखने लिए वह आज भी घबराती होंगी

मेरी थोड़ी सी तारीफों में वह फिर से झूम जाती होगी



मेरे साथ चुपके से वह फिर घाट किनारे को जाती होगी

मेरे साथ वह हर सुख शांति मन ही मन पाती होंगी

शायद वह  आज भी मुझे इस कदर चाहती होगी
 
शायद वह आज भी मुझे इस कदर चाहती होगी

                  आलोक पुराणिक