मैं मजदूर हूं,
मैं वही मजदूर हूं,जो कल-कारखानों में अपने खून को पसीने में बहा कर समाज को बहुत कुछ देता हूं।

मैंने बनाए हैं कितनों को रईस,
गाड़ी-बंगलों में घूमने लायक,
मगर आज परिवार के पेट पालने को लाचार हूं।


मैं वही मजदूर हूं जिस पर आरोप है कि मैं अशिक्षित हूं,
असभ्य हूं, जाहिल-गंवार हूं।

मगर मुझे मालूम है,
इतने आरोपों के बावजूद मैं ही सबके लिए आखिरी आस हूं।


जब मेरे बच्चे भूखे होते हैं तो रात भर सिसक-सिसक कर रोता हूं, फिर भी मैं मरता नहीं।

मन में एक आस लिए प्रतिदिन निर्निमेष पलकों से चौराहे पर खरा बांट जोहता हूं,
शायद मिल जाए कुछ काम इस ललक में सोता भी नहीं हूं।



मैं एक मजदूर हूं।
मैं आत्मनिर्भर हूं,
सहनशील हूं,
मेरा भी आत्मसम्मान है,
मगर बच्चों के आगे मौन हूं। 

मैं दूसरों के खातिर बंगले बना सकता हूं, 
तनाव कम करने का उपाय कर सकता हूं,
प्रकृति की गोद में जीने का प्रबंध कर सकता हूं।


मैं सब कुछ कर सकता हूं,
दो वक्त की रोटी खातिर।
दूसरे को फ्रिज का पानी पिलाकर खुद घड़े का पीता हूं, 
चारपाई डाल कहीं भी सो लेता हूं।

मुझे आदत नहीं मक्खन-दूध-मिठाई की,
मैं रूखी-सुखी कुछ भी खा कर जी लेता हूं,
क्योंकि मैं एक मजदूर हूं। 


मेरे पास कुछ भी नहीं है हारने को मगर सबको जीतने का हौसला रखता हूं।
हां मैं एक मजदूर हूं।
 
                ✍️ प्रकाश तिवारी